Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 38

83 Mantra
11/38
Devata- आपो देवताः Rishi- सिन्धुद्वीप ऋषिः Chhand- न्युङ्कुसारिणी बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ॒पो दे॒वीरुप॑सृज॒ मधु॑मतीरय॒क्ष्माय॑ प्र॒जाभ्यः॑। तासा॑मा॒स्थाना॒दुज्जि॑हता॒मोष॑धयः सुपिप्प॒लाः॥३८॥

अ॒पः। दे॒वीः। उप॑। सृ॒ज॒। मधु॑मती॒रिति॒ मधु॑ऽमतीः। अ॒य॒क्ष्माय॑। प्र॒जाभ्य॒ इति॑ प्र॒ऽजाभ्यः॑। तासा॑म्। आ॒स्थाना॒दित्या॒ऽस्थाना॑त्। उत्। जि॒ह॒ता॒म्। ओष॑धयः। सु॒पि॒प्प॒ला इति॑ सुऽपिप्प॒लाः ॥३८ ॥

Mantra without Swara
अपो देवीरुपसृज मधुमतीरयक्ष्माय प्रजाभ्यः । तासामास्थानादुज्जिहतामोषधयः सुपिप्पलाः ॥

अपः। देवीः। उप। सृज। मधुमतीरिति मधुऽमतीः। अयक्ष्माय। प्रजाभ्य इति प्रऽजाभ्यः। तासाम्। आस्थानादित्याऽस्थानात्। उत्। जिहताम्। ओषधयः। सुपिप्पला इति सुऽपिप्पलाः॥३८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे श्रेष्ठ वैद्य! आप (मधुमतीः) प्रशंसनीय मधुर आदि गुणों वाले (देवीः) पवित्र (अपः) जलों को (उप+सृज) सिद्ध करो। जिससे (तासाम्) उन जलों के (आस्थानात्) सर्वत्र विद्यमान होने से (सुपिप्पलाः) सुन्दर फलवाली (ओषधयः) सोम आदि ओषधियाँ (प्रजाभ्यः) पालन करने योग्य प्रजा को (अयक्ष्माय) यक्ष्मा आदि रोगों के निवारण के लिये (उत्+जिहताम्) प्राप्त होवे ॥११ । ३८ ॥
Essence
राजा दो प्रकार के वैद्यों का संरक्षरण करे। पहले, सुगन्धित पदार्थों के होम से वायु, वृष्टि और ओषधियों को शुद्ध करें। दूसरे, सज्जन वैद्य विद्वान् लोग निदान आदि के द्वारा सब प्राणियों को सदा नीरोग रखें।
क्योंकि इस कर्म के बिना समाज को कभी सुख प्राप्त नहीं हो सकता ॥११ । ३८ ॥
Subject
अब जल आदि पदार्थों के शोधने से प्रजा में क्या होता है, इस विषय का उपदेश किया जाता है॥
Commentary Essence
जलादि पदार्थों की शुद्धि से प्रजा में क्या होता है--राजा का कर्त्तव्य है कि वह दो प्रकार के वैद्यों का संरक्षण करे। एक वैद्य ऐसे हों जो प्रशस्त मधुर आदि गुणों से युक्त, जलों को सुगन्धित पदार्थों के होम से जल, वायु और ओषधियों को शुद्ध करें। दूसरे श्रेष्ठ वैद्य ऐसे विद्वान् हों जो निदान आदि के द्वारा सब प्राणियों को सदा नीरोग रखें। शुद्ध जल से उत्पन्न, सुन्दर फल वाली सोम आदि औषधियों का प्रजा के यक्ष्मा आदि रोगों के निवारण में प्रयोग करें। इस प्रकार जल आदि पदार्थों की शुद्धि से प्रजा में सुख उत्पन्न होता है। इस कर्म के बिना समाज को कभी सुख प्राप्त नहीं हो सकता ॥११ । ३८ ॥