Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 36

83 Mantra
11/36
Devata- अग्निर्देवता Rishi- गृत्समद ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नि होता॑ होतृ॒षद॑ने॒ विदा॑नस्त्वे॒षो दी॑दि॒वाँ२ऽअ॑सदत् सु॒दक्षः॑। अद॑ब्धव्रतप्रमति॒र्वसि॑ष्ठः सहस्रम्भ॒रः शुचि॑जिह्वोऽअ॒ग्निः॥३६॥

नि। होता॑। हो॒तृ॒षद॑ने। हो॒तृ॒सद॑न॒ इति॑ होतृ॒सद॑ने। विदा॑नः। त्वे॒षः। दी॒दि॒वानिति॑ दीदि॒ऽवान्। अ॒स॒द॒त्। सु॒दक्ष॒ इति॑ सु॒ऽदक्षः॑। अद॑ब्धव्रतप्रमति॒रित्यद॑ब्धव्रतऽप्रमतिः। वसि॑ष्ठः। स॒ह॒स्र॒म्भ॒र इति॑ सहस्रम्ऽभ॒रः। शुचि॑जिह्व॒ इति॒ शुचि॑ऽजिह्वः। अ॒ग्निः ॥३६ ॥

Mantra without Swara
नि होता होतृषदने विदानस्त्वेषो दीदिवाँ ऽअसदत्सुदक्षः । अदब्धव्रतप्रमतिर्वसिष्ठः सहस्रम्भरः शुचिजिह्वोऽअग्निः ॥

नि। होता। होतृषदने। होतृसदन इति होतृसदने। विदानः। त्वेषः। दीदिवानिति दीदिऽवान्। असदत्। सुदक्ष इति सुऽदक्षः। अदब्धव्रतप्रमतिरित्यदब्धव्रतऽप्रमतिः। वसिष्ठः। सहस्रम्भर इति सहस्रम्ऽभरः। शुचिजिह्व इति शुचिऽजिह्वः। अग्निः॥३६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
यदि नर, मनुष्य-जन्म को प्राप्त करके (होतृषदने) विद्या के दाता विद्वानों के घर में, (दीदिवान्) धर्मयुक्त व्यवहार को करने का इच्छुक, (त्वेषः) शुभ-गुणों से देदीप्यमान, (विदानः) जिज्ञासु, (शुचिजिह्वः) सत्यभाषण से पवित्र वाणी वाला [अग्निः] अग्नि के समान तेजस्वी (सुदक्षः) उत्तम बल वाला, (अदब्धव्रतप्रमतिः) हिंसा के आयोग्य=ग्रहण करने योग्य/ अयोग्य=ग्रहण न करने योग्य व्रत अर्थात् धर्माचरण से उत्तम मेधा वाला, (वसिष्ठः) अत्यन्त समीप रहने वाला अन्तेवासी, (सहस्रम्भरः) सहस्र=असंख्य शुभ गुणों को धारण करने वाला, (होता) शुभ गुणों को ग्रहण करने वाला, होकर नित्य (नि+असदत्) विद्यमान रहे तो सकल सुख को प्राप्त करें ॥११ । ३६ ॥
Essence
जब माता-पिता अपने पुत्रों और कन्याओं को सुशिक्षा करके फिर विद्वानों और विदुषियों के समीप चिरकाल तक रखकर पढ़ावें, तब वे सूर्य के समान कुल और देश को चमकाने वाले हों ॥११ । ३६ ॥
Subject
फिर मनुष्यों के कर्त्तव्य का उपदेश किया है॥
Commentary Essence
मनुष्यों का कर्त्तव्य--माता-पिता का कर्तव्य है कि वे अपने पुत्रों और कन्याओं को विद्या देने वाले विद्वानों और विदुषियों के पास में चिरकाल तक रखें, जिससे वे धर्मयुक्त व्यवहार की कामना करने वाले, शुभ गुणों से देदीप्यमान होकर अपने कुल और देश को चमकाने वाले, ज्ञान के अभिलाषी, सत्यभाषण से पवित्र जिह्वा वाले, अग्नि के समान तेजस्वी, उत्तम बल वाले, धर्माचरण के अनुष्ठान से उत्तम मेधा वाले, अन्तेवासी, असंख्य शुभ गुणों को धारण करने वाले, शुभ गुणों को ग्रहण करने वाले होकर सुख को प्राप्त करें ॥११ । ३६ ॥