Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 35

83 Mantra
11/35
Devata- होता देवता Rishi- देवश्रवदेववातावृषी Chhand- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सीद॑ होतः॒ स्वऽउ॑ लो॒के चि॑कि॒त्वान्त्सा॒दया॑ य॒ज्ञꣳ सु॑कृ॒तस्य॒ योनौ॑। दे॒वा॒वीर्दे॒वान् ह॒विषा॑ यजा॒स्यग्ने॑ बृ॒हद्यज॑माने॒ वयो॑ धाः॥३५॥

सीद॑। हो॒त॒रिति॑ होतः। स्वे। ऊँ॒ इत्यूँ॑। लो॒के। चि॒कि॒त्वान्। सा॒दय॑। य॒ज्ञम्। सु॒कृ॒तस्येति॑ सुऽकृ॒तस्य॑। योनौ॑। दे॒वा॒वीरिति॑ देवऽअ॒वीः। दे॒वान्। ह॒विषा॑। य॒जा॒सि॒। अग्ने॑। बृ॒हत्। यज॑माने। वयः॑। धाः॒ ॥३५ ॥

Mantra without Swara
सीद होतः स्वऽउ लोके चिकित्वान्सादया यज्ञँ सुकृतस्य योनौ । देवावीर्देवान्हविषा यजास्यग्ने बृहद्यजमाने वयो धाः ॥

सीद। होतरिति होतः। स्वे। ऊँ इत्यूँ। लोके। चिकित्वान्। सादय। यज्ञम्। सुकृतस्येति सुऽकृतस्य। योनौ। देवावीरिति देवऽअवीः। देवान्। हविषा। यजासि। अग्ने। बृहत्। यजमाने। वयः। धाः॥३५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् ! आप (होतः) देने और लेने वाले तथा (चिकित्वान्) विज्ञान से युक्त हो, सो (स्वे) सुखयुक्त (लोके) लोक में [उ] विचारपूर्वक (सीद) विराजमान रहो।
(सुकृतस्य) उत्तम कर्म करने वाले धार्मिक पुरुष के (योनौ) निमित्त [बृहत्] महान् (यज्ञम्) धर्मयुक्त राजा और प्रजा के व्यवहार को (सादय) प्राप्त कराइये ।
आप (देवावी:) देवों=विद्वानों से रक्षित और शिक्षित होकर (हविषा) ग्रहण करने-कराने योग्य न्याय से (देवान्) विद्वानों वा दिव्य गुणों का (यजासि) संग कराइये, तथा (यजमाने) राजा आदि को चिरंजीवी एवं उनमें (वयः) दीर्घ आयु को (धाः) स्थापित कीजिये ॥११ । ३५ ॥
Essence
विद्वान् इस जगत् में दो कर्म सदा करें। पहिला, ब्रह्मचारी और जितेन्द्रियता आदि की शिक्षा से शरीर के आरोग्य तथा बल आदि से युक्त दीर्घ आयु को, दूसरा, विद्या और क्रियाकौशल को ग्रहण करके आत्मिक बल को सिद्ध करें।
जिससे सब मनुष्य शारीरिक और आत्मिक बल से युक्त होकर सदा आनन्द में रहें ॥११ । ३५ ॥
Subject
फिर विद्वान् का क्या काम है, यह उपदेश किया है ॥
Refrences
(सादया) सादय। यहाँ 'अन्येषामपि दृश्यते' [अ० ६ । ३ । १३५] इस सूत्र से दीर्घ है ॥११ । ३५ ॥
Commentary Essence
विद्वानों का कर्त्तव्य--विद्वान् पुरुष विद्या और क्रियाकौशल का ग्रहण करने-कराने वाले, तथा विज्ञानवान् हों। वे सुखमय लोक में स्थित रहें। धार्मिकता के निमित्त बृहद् यज्ञ अर्थात् धर्मयुक्त राजव्यवहार और प्रजा व्यवहार को प्राप्त करावें। देव अर्थात् विद्वानों से रक्षित और शिक्षित होकर ग्रहण करने-कराने योग्य न्याय से विद्वानों तथा दिव्य गुणों का संग करें। अर्थात् ब्रह्मचर्य, जितेन्द्रियता आदि की शिक्षा से शरीर को नीरोग और बल आदि गुणों से युक्त करके चिरंजीव (दीर्घायु) बनें। विद्या और क्रियाकौशल को ग्रहण करके आत्मबल को बढ़ावें। जिससे सब मनुष्य शारीरिक और आत्मिक बल से युक्त होकर सदा आनन्द में रहें ॥११ । ३५ ॥