Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 32

83 Mantra
11/32
Devata- अग्निर्देवता Rishi- भारद्वाज ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पु॒री॒ष्योऽसि वि॒श्वभ॑रा॒ऽअथ॑र्वा त्वा प्रथ॒मो निर॑मन्थदग्ने। त्वाम॑ग्ने॒ पुष्क॑रा॒दध्यथ॑र्वा॒ निर॑मन्थत॥ मू॒र्ध्नो विश्व॑स्य वा॒घतः॑॥३२॥

पु॒री॒ष्यः᳖। अ॒सि॒। वि॒श्वभ॑रा॒ इति॑ वि॒श्वऽभ॑राः। अथ॑र्वा। त्वा॒। प्र॒थ॒मः। निः। अ॒म॒न्थ॒त्। अ॒ग्ने॒। त्वाम्। अ॒ग्ने॒। पुष्क॑रात्। अधि॑। अथ॑र्वा। निः। अ॒म॒न्थ॒त॒। मू॒र्ध्नः। विश्व॑स्य। वा॒घतः॑ ॥३२ ॥

Mantra without Swara
पुरीष्योसि विश्वभराऽअथर्वा त्वा प्रथमो निरमन्थदग्ने । त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत । मूर्ध्ना विश्वस्य वाघतः ॥

पुरीष्यः। असि। विश्वभरा इति विश्वऽभराः। अथर्वा। त्वा। प्रथमः। निः। अमन्थत्। अग्ने। त्वाम्। अग्ने। पुष्करात्। अधि। अथर्वा। निः। अमन्थत। मूर्ध्नः। विश्वस्य। वाघतः॥३२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) क्रिया-कौशल को सिद्ध करने वाले विद्वान् ! आप (वाघतः) मेधावी तथा (पुरीष्यः) पशुओं को सुख देने वाले (असि) हो, सो (त्वा) आपको (अथर्वा) अहिंसक विद्वान् जो (प्रथमः) आदिम (विश्वभराः) विश्व का धारण-पोषण करने वाला है वह (विश्वस्य) समग्र संसार के (मूर्ध्नः) शिर के समान (पुष्करात्) अन्तरिक्ष से अग्नि=विद्युत् का (निः+अमन्थत्) मन्थन करता है, वह ऐश्वर्य को प्राप्त करता है ॥११ । ३२ ॥
Essence
जो इस जगत् में विद्वान् हों वे सुविचार और पुरुषार्थ से अग्नि आदि विद्या को सिद्ध करके सबको सिखलावें ॥११ । ३२ ॥
Subject
विद्वान् पुरुष बिजली को कैसे उत्पन्न करे, यह उपदेश किया है ॥
Refrences
(वाघतः) 'वाघ' शब्द निघं० (३ । १५) में मेधावी-नामों में पढ़ा है ॥११ । ३२ ॥
Commentary Essence
विद्वान् विद्युत् को कैसे उत्पन्न करें--विद्वान् पुरुष क्रियाकौशल को सिद्ध करने वाला, मेधावी, गौ, आदि पशुओं को सुख देने वाला, अहिंसक शुभ कर्मों में प्रथम, विश्व का धारण-पोषण करने वाला हो। वह समग्र संसार के शिर के तुल्य अन्तरिक्ष से अग्नि=विद्युत् को उत्पन्न करे। विद्वान् पुरुष सुविचार और पुरुषार्थ के द्वारा अग्नि=विद्युत्-विद्या को सिद्ध करके सबको सिखलावें ॥११ । ३२ ॥