Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 30

83 Mantra
11/30
Devata- दम्पती देवते Rishi- गृत्समद ऋषिः Chhand- विराडार्ष्यनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
शर्म॑ च॒ स्थो वर्म॑ च॒ स्थोऽछि॑द्रे बहु॒लेऽउ॒भे। व्यच॑स्वती॒ संव॑साथां भृ॒तम॒ग्निं पु॑री॒ष्यम्॥३०॥

शर्म्म॑। च॒। स्थः॒। वर्म्म॑। च॒। स्थः॒। अछि॑द्रे॒ऽइत्यछि॑द्रे। ब॒हु॒लेऽइति॑ बहु॒ले। उ॒भेऽइत्यु॒भे। व्यच॑स्वती॒ऽइति॑ व्यच॑स्वती। सम्। व॒सा॒था॒म्। भृ॒तम्। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳖म् ॥३० ॥

Mantra without Swara
शर्म च स्थो वर्म च स्थोच्छिद्रे बहुलेऽउभे । व्यचस्वती सँवसाथाम्भृतमग्निं पुरीष्यम् ॥

शर्म्म। च। स्थः। वर्म्म। च। स्थः। अछिद्रेऽइत्यछिद्रे। बहुलेऽइति बहुले। उभेऽइत्युभे। व्यचस्वतीऽइति व्यचस्वती। सम्। वसाथाम्। भृतम्। अग्निम्। पुरीष्यम्॥३०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे स्त्री-पुरुषो ! तुम दोनों (शर्म्म) घर (च) और घर की सामग्री को प्राप्त हुए (स्थः) हो, तथा (वर्म्म) सब ओर से सुरक्षा (च) और सुरक्षा में सहायक पदार्थों को प्राप्त हो, और (उभे) दोनों (बहुले) बहुत पदार्थों को प्राप्त कराने वाले, (व्यचस्वती) सुख से व्याप्त (अच्छिद्रे) दोषरहित विद्युत् और अन्तरिक्ष के समान (स्थः) हो। सो उस घर में (भृतम्) विद्यमान (पुरीष्यम्) पालकों में श्रेष्ठ (अग्निम्) विद्युत् को ग्रहण करके (सम्+वसाथाम्) उसे आच्छादित करो ॥११।३०॥
Essence
गृहस्थ लोग ब्रह्मचर्य से सत्कार, उपकार और क्रिया-कौशल की विद्या को ग्रहण करके बहुत द्वारों वाले, सब ऋतुओं में सुखदायक, सब ओर से सुरक्षित, अग्नि=विद्युत् आदि साधनों से युक्त घरों को बनाकर उनमें सुख से निवास करें ॥११ । ३० ॥
Subject
अब स्त्री और पुरुष घर में रह के क्या सिद्ध करें, यह उपदेश किया है ॥
Commentary Essence
१. स्त्री-पुरुष घर में क्या सिद्ध करें--स्त्री और पुरुष ब्रह्मचर्य के द्वारा सत्कार, उपकार और क्रियाकौशल की विद्या को प्राप्त करके घर और उसकी सामग्री को प्राप्त करें। सब ओर से रक्षा और उसमें सहायक घर आदि का निर्माण करें। घर ऐसे बनावें जो बहुत द्वारों वाले, सब ऋतुओं में सुखदायक, सब ओर से सुरक्षित तथा पालक अग्नि आदि साधनों से युक्त हों।
२. स्त्री-पुरुष--घर और तत्सम्बन्धी सामग्री से युक्त, सब ओर से रक्षित तथा रक्षा में सहायक सामग्री से सम्पन्न, विद्युत् और अन्तरिक्ष के समान निर्दोष हों। विद्युत् और अन्तरिक्ष बहुत अर्थों के प्रापक और सुख से व्याप्त हैं, वैसे स्त्री-पुरुष भी होवें ॥११ । ३० ॥