Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 3

83 Mantra
11/3
Devata- सविता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यु॒क्त्वाय॑ सवि॒ता दे॒वान्त्स्व॑र्य॒तो धि॒या दिव॑म्। बृ॒हज्ज्योतिः॑ करिष्य॒तः स॑वि॒ता प्रसु॑वाति॒ तान्॥३॥

यु॒क्त्वाय॑। स॒वि॒ता। दे॒वान्। स्वः॑। य॒तः। धि॒या। दिव॑म्। बृ॒हत्। ज्योतिः॑। क॒रि॒ष्य॒तः। स॒वि॒ता। प्र। सु॒वा॒ति॒। तान् ॥३ ॥

Mantra without Swara
युक्त्वाय सविता देवान्त्स्वर्यतो धिया दिवम् । बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्र सुवाति तान् ॥

युक्त्वाय। सविता। देवान्। स्वः। यतः। धिया। दिवम्। बृहत्। ज्योतिः। करिष्यतः। सविता। प्र। सुवाति। तान्॥३॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
(सविता) योग और पदार्थज्ञान को उत्पन्न करने वाला पुरुष परमात्मा में मन को (युक्त्वाय) युक्त करके (धिया) बुद्धि से (दिवम्) विद्या प्रकाश को तथा (स्वः) सुख के (यतः) प्राप्त कराने हारे, (बृहत्) महान् (ज्योतिः) विज्ञान को (करिष्यतः) उत्पन्न करने वाले (देवान्) जिन दिव्य गुणों को (प्र+सुवाति) उत्पन्न करता है; उन दिव्य गुणों को अन्य जन भी (सविता) प्रेरणावान् होकर (प्रसुवेत्) उत्पन्न करे ॥११ । ३॥ जो पुरुष उपदेशक से योग और तत्त्वज्ञान को प्राप्त करके इस प्रकार अभ्यास करे वह भी इन दिव्य गुणों को प्राप्त कर सकता है ॥ ११ । ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। जो युक्त आहार-विहार वाले योगी एकान्त देश में परमात्मा में समाधिस्थ होते हैं, वे तत्त्वज्ञान को प्राप्त करके नित्य-सुख को प्राप्त करते हैं ॥११ । ४ ॥
Subject
योगाभ्यास और भूगर्भविद्या का फिर उपदेश किया है॥
Refrences
(वयुनावित्) यहाँ 'अन्येषामपि दृश्यते' [ अ० ६ । ४ । १३५] इस से दीर्घ है ॥११ । ४ ॥
Commentary Essence
योग और पदार्थ विद्या--योग और पदार्थज्ञान को अपनी आत्मा में उत्पन्न करने का अभिलाषी व्यक्ति परमात्मा में अपने मन को लगाकर, बुद्धि के द्वारा विद्या के प्रकाश को, सुख को प्राप्त कराने हारे महान् पदार्थ विज्ञान के उत्पादक एवं अविद्या आदि क्लेशों के निवारक दिव्य (शुद्ध) गुणों को अपनी आत्मा में स्वयं उत्पन्न कर सकता है। और जो कोई विद्वान् उपदेशक से योग और पदार्थज्ञान को प्राप्त करके इसका अभ्यास करता रहे वह भी इन दिव्य गुणों को प्राप्त कर सकता है ॥
Elsewhere Availablity
इसी प्रकार वह परमेश्वर देव भी (देवान्) उपासकों को (स्वर्यतो धिया दिवम्) अत्यन्त सुख को दे के (सविता) उनकी बुद्धि के साथ अपने आनन्दस्वरूप प्रकाश को करता है, तथा (युक्त्वाय) वही अन्तर्यामी परमात्मा अपनी कृपा से उनको युक्त करके उनके आत्माओं में (बृहज्ज्योतिः) बड़े प्रकाश को प्रकट करता है, और (सविता) जो सब जगत् का पिता है, वही (प्रसुवा०) उन उपासकों को ज्ञान और आनन्द आदि से परिपूर्ण कर देता है, परन्तु (करिष्यतः) जो मनुष्य सत्य प्रेम भक्ति से परमेश्वर की उपासना करेंगे, उन्हीं उपासकों को परम कृपामय अन्तर्यामी परमेश्वर मोक्ष-सुख देके सदा के लिये आनन्द-युक्त कर देगा ॥(ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका : उपासनाविषय) ॥