Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 29

83 Mantra
11/29
Devata- अग्निर्देवता Rishi- गृत्समद ऋषिः Chhand- स्वराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒पां पृ॒ष्ठम॑सि॒ योनि॑र॒ग्नेः स॑मु॒द्रम॒भितः॒ पिन्व॑मानम्। वर्ध॑मानो म॒हाँ२ऽआ च॒ पुष्क॑रे दि॒वो मात्र॑या वरि॒म्णा प्र॑थस्व॥२९॥

अ॒पाम्। पृ॒ष्ठम्। अ॒सि॒। योनिः॑। अ॒ग्नेः। स॒मु॒द्रम्। अ॒भितः॑। पिन्व॑मानम्। वर्ध॑मानः। म॒हान्। आ। च॒। पुष्क॑रे। दि॒वः। मात्र॑या। व॒रि॒म्णा। प्र॒थ॒स्व॒ ॥२९ ॥

Mantra without Swara
अपाम्पृष्ठमसि योनिरग्नेः समुद्रमभितः पिन्वमानम् । वर्धमानो महाँ आ च पुष्करे दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथस्व ॥

अपाम्। पृष्ठम्। असि। योनिः। अग्नेः। समुद्रम्। अभितः। पिन्वमानम्। वर्धमानः। महान्। आ। च। पुष्करे। दिवः। मात्रया। वरिम्णा। प्रथस्व॥२९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वान्! क्योंकि आप (अग्ने) सर्वत्र व्यापक विद्युत् रूप अग्नि से गति करने वाले, (योनिः) संयोग-विभाग को जानने वाले, (महान्) पूज्य और (वर्धमानः) विद्या के द्वारा क्रिया-कौशल से नित्य वृद्धि को प्राप्त करने वाले (असि) हो, अतः (अभितः) सब ओर (पिन्वमानम्) जल बरसाने वाले, (अपाम्) जलों के (पृष्ठम्) आधार, (पुष्करे) अन्तरिक्ष=आकाश में विद्यमान (दिवः) दीप्ति की (मात्रया) मात्रा से बढ़ने वाले, (समुद्रम्) जिससे जल ऊपर को जाते हैं उस सागर को तथा (च) उसमें विद्यमान सब मूर्त्त पदार्थों को जानकर (वरिम्णा) आधिक्य से (आ+प्रथस्व) विस्तृत सुख वाले बनो ॥११ । २९॥
Essence
हे मनुष्यो! तुम, जैसे पृथिवी आदि मूर्त पदार्थों में विद्युत् विद्यमान है वैसे जल में भी है, ऐसा मानकर उससे उपकार ग्रहण करके विस्तृत सुखों को सिद्ध करो ॥११ । २९ ॥
Subject
फिर मनुष्य कैसी विद्युत् को ग्रहण करें, यह उपदेश किया है॥
Refrences
(पुष्करे) 'पुष्कर' शब्द निघं० (१ । ३) में अन्तरिक्ष-नामों में पढ़ा है ॥११ । २९॥
Commentary Essence
१. विद्वान् सर्वत्र व्याप्त विद्युत् रूप अग्नि से गति करने वाला--चलने वाला, संयोग और विभाग का वेत्ता, पूज्य, विद्या के द्वारा क्रियाकौशल से नित्य वृद्धि को प्राप्त करने वाला हो।
२. विद्युत्--मनुष्य उक्त विद्वान् से सागर और उसमें स्थित पदार्थों को जानें। जो सागर सब ओर से सेचन करने वाला, जलों का आधार, अन्तरिक्ष में विद्यमान दीप्ति की मात्रा (चन्द्र) से बढ़ने वाला है ।
जैसे पृथिवी आदि मूर्त पदार्थों में विद्युत् विद्यमान है वैसे जल (समुद्र) में भी है। उससे मनुष्य उपकार ग्रहण करके सुखों को सिद्ध करें ॥११ । २९ ॥