Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 28

83 Mantra
11/28
Devata- अग्निर्देवता Rishi- गृत्समद ऋषिः Chhand- प्रकृतिः Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑सवेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। पृ॒थि॒व्याः स॒धस्था॑द॒ग्निं पु॑री॒ष्यमङ्गिर॒स्वत् ख॑नामि। ज्योति॑ष्मन्तं त्वाग्ने सु॒प्रती॑क॒मज॑स्रेण भा॒नुना॒ दीद्य॑तम्। शि॒वं प्र॒जाभ्योऽहि॑ꣳसन्तं पृथि॒व्याः स॒धस्था॑द॒ग्निं पु॑री॒ष्यमङ्गिर॒स्वत् ख॑नामः॥२८॥

दे॒वस्य॑। त्वा॒। स॒वि॒तुः। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वे। अ॒श्विनोः॑। बा॒हुभ्या॑म्। पू॒ष्णः। हस्ता॑भ्याम्। पृ॒थि॒व्याः। स॒धस्था॒दिति॑ स॒धऽस्था॑त्। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳖म्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। ख॒ना॒मि॒। ज्योति॑ष्मन्तम्। त्वा। अ॒ग्ने॒। सु॒प्रती॑क॒मिति॑ सु॒ऽप्रती॑कम्। अज॑स्रेण। भा॒नुना॑। दीद्य॑तम्। शि॒वम्। प्र॒जाभ्य॒ इति॑ प्र॒ऽजाभ्यः॑। अहि॑ꣳसन्तम्। पृ॒थि॒व्याः। स॒धस्था॒दिति॑ स॒धऽस्था॑त्। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳖म्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। ख॒ना॒मः॒ ॥२८ ॥

Mantra without Swara
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्याम्पूष्णो हस्ताभ्याम् । पृथिव्याः सधस्थादग्निं पुरीष्यमङ्गिरस्वत्खनामा। ज्योतिष्मन्तन्त्वाग्ने सुप्रतीकमजस्रेण भानुना दीद्यतम् । शिवम्प्रजाभ्यो हिँसन्तँ पृथिव्या सधस्थादग्निम्पुरीष्यमङ्गिरस्वत्खनामः ॥

देवस्य। त्वा। सवितुः। प्रसव इति प्रऽसवे। अश्विनोः। बाहुभ्याम्। पूष्णः। हस्ताभ्याम्। पृथिव्याः। सधस्थादिति सधऽस्थात्। अग्निम्। पुरीष्यम्। अङ्गिरस्वत्। खनामि। ज्योतिष्मन्तम्। त्वा। अग्ने। सुप्रतीकमिति सुऽप्रतीकम्। अजस्रेण। भानुना। दीद्यतम्। शिवम्। प्रजाभ्य इति प्रऽजाभ्यः। अहिꣳसन्तम्। पृथिव्याः। सधस्थादिति सधऽस्थात्। अग्निम्। पुरीष्यम्। अङ्गिरस्वत्। खनामः॥२८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) शिल्पविद्या एवं भूगर्भ आदि विद्या के जानने वाले विद्वान्! जैसे मैं (सवितुः) सबके उत्पादक (देवस्य) प्रकाशमान ईश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये इस संसार में (अश्विनोः) द्युलोक और पृथिवी के आकर्षण और धारण शक्ति के समान (बाहुभ्याम्) अपनी भुजाओं से, (पूष्णः) प्राण के बल और पराक्रम के तुल्य (हस्ताभ्याम्) अपने हाथों से (त्वा) आपको आगे करके (पृथिव्याः) पृथिवी के (सधस्थात्) स्थान से (पुरीष्यम्) सुखों से पूर्ण करने वाले पदार्थों में विद्यमान, (ज्योतिष्मन्तम्) नाना ज्योतियों से (युक्त), (सुप्रतीकम्) उत्तम सुखदायक (अजस्रेण) निरन्तर (भानुना) दीप्ति से (दीद्यतम्) देदीप्यमान, ( पुरीष्यम्) पालक साधनों में श्रेष्ठ (अग्निम्) विद्युत् को जो (अङ्गिरस्वत्) वायु के समान सर्वत्र व्यापक है उसे (खनामि) सिद्ध करता हूँ; वैसे [त्या] आपके आश्रित होकर हम लोग (पृथिव्याः) आकाश के (सधस्थात्) स्थान से (अङ्गिरस्वत्) सूक्ष्म रूप वायु के समान सर्वत्र विद्यमान, (अहिंसन्तम्) दुःखरहित, (पुरीष्यम्) पालक साधनों में विद्यमान (प्रजाभ्यः) प्रजा के लिये (शिवम् ) मङ्गलमय, (अग्निम्) वायु में स्थित विद्युत् को (खनामः) सिद्ध करते हैं, वैसे सब सिद्ध करें ॥११ । २८ ॥
Essence
जो राजपुरुष और प्रजा जन सर्वत्र विद्यमान विद्युत् रूप अग्नि को सब पदार्थों से साधन-उपसाधनों के द्वारा प्रसिद्ध करके उसका कार्यों में प्रयोग करते हैं, वे मङ्गलमय ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं। कोई भी उत्पन्न वस्तु विद्युत् की व्याप्ति से रहित नहीं है, ऐसा सब लोग जानें ॥११ । २८
Subject
मनुष्य क्या करके किस पदार्थ से विद्युत् को ग्रहण करें, यह उपदेश किया है ॥
Commentary Essence
१. मनुष्य किससे विद्युत् को ग्रहण करें--सकल जगत् के उत्पादक, प्रकाशमान ईश्वर के उत्पन्न किये इस संसार में द्युलोक और भूलोक के आकर्षण और धारण रूप भुजाओं से, वायु के बल और पराक्रम रूप हाथों से विद्वान् लोग शिल्पविद्या तथा भूगर्भविद्या के वेत्ता पुरुष को अग्रणी बनाकर पृथिवी से अग्नि=विद्युत् को ग्रहण करते हैं। २. विद्युत्--अग्नि अर्थात् विद्युत् सुखों से पूर्ण करने वाले पदार्थों में विद्यमान है, नाना ज्योतियों वाला है, उत्तम सुखों का दाता है, निरन्तर दीप्ति से देदीप्यमान है, आकाश में सूक्ष्म वायु के समान विद्यमान है, हिंसा रहित है, प्रजा के लिये मङ्गलमय है, वायु में स्थित है। यह विद्युत् रूप अग्नि सब पदार्थों में विद्यमान है। उनसे साधन-उपसाधनों के द्वारा प्रसिद्ध करके उसका कार्यों में प्रयोग करें और उससे मङ्गलमय ऐश्वर्य को प्राप्त करें। कोई भी वस्तु विद्युत् की व्याप्ति से रहित नहीं है ॥११ । २८ ॥