Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 26

83 Mantra
11/26
Devata- अग्निर्देवता Rishi- पायुर्ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
परि॑ त्वाग्ने॒ पुरं॑ व॒यं विप्र॑ꣳ सहस्य धीमहि। धृ॒षद्व॑र्णं दि॒वेदि॑वे ह॒न्तारं॑ भङ्गु॒राव॑ताम्॥२६॥

परि॑। त्वा॒। अ॒ग्ने॒। पुर॑म्। व॒यम्। विप्र॑म्। स॒ह॒स्य॒। धी॒म॒हि॒। धृ॒षद्व॑र्ण॒मिति॑ धृ॒षत्ऽव॑र्णम्। दि॒वेदि॑व॒ इति॑ दि॒वेऽदि॑वे। ह॒न्तार॑म्। भ॒ङ्गु॒राव॑ताम्। भ॒ङ्गु॒रव॑ता॒मिति॑ भङ्गु॒रऽव॑ताम् ॥२६ ॥

Mantra without Swara
परित्वाग्ने पुरँवयं विप्रँ सहस्य धीमहि । धृषद्वर्णन्दिवेदिवे हन्तारम्भङ्गुरावताम् ॥

परि। त्वा। अग्ने। पुरम्। वयम्। विप्रम्। सहस्य। धीमहि। घृषद्वर्णमिति धृषत्ऽवर्णम्। दिवेदिव इति दिवेऽदिवे। हन्तारम्। भङ्गुरावताम्। भङ्गुरवतामिति भङ्गुरऽवताम्॥२६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (सहस्य) अपनी बल=सेना की कामना करने वाले (अग्ने) विद्या से प्रकाशमान सेनापते! जैसे हम लोग (दिवे दिवे) प्रतिदिन (भङ्गुरावताम्) कुत्सित स्वभाव को भङ्ग=नष्ट करने वाले पुरुषों के (पुरम्) पालक, अग्नि के समान (हन्तारम्) शत्रुओं का हनन करने वाले, (धृषद्वर्णम्) उत्तम वर्ण वाले=रूपवान् (विप्रं त्वाम्) आप विद्वान् पुरुष को (परि+धीमहि) धारण करते हैं, वैसे आप हमें धारण करो ।
Essence
इस मन्त्र में वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है॥ राजा और प्रजा के लोग न्याय से प्रजा के रक्षक, अग्नि के समान शत्रुओं के घातक और सर्वदा सुख देने वाले पुरुष को सेनापति बनावें ॥११ । २६ ॥
Subject
कैसा सेनापति करना चाहिए, यह उपदेश किया है॥
Refrences
(धीमहि) यहाँ 'डुधाञ्' धातु के लिङ् लकार में आर्धधातुक संज्ञा होने से ' शप्' का अभाव है ॥११ । २६ ॥
Commentary Essence
१. सेनापति कैसा बनावें--जो अपने बल=सेना का इच्छुक, विद्या से प्रकाशमान, जिन्होंने अपनी दुष्ट प्रकृति को नष्ट कर दिया है, उन श्रेष्ठ पुरुषों के पालक, अग्नि के समान दुष्टों का दहन करने वाला, रूपवान् और विद्वान् हो, उसे सेनापति बनावें। वह न्याय से प्रजा का रक्षक, अग्नि के समान शत्रुओं का घातक और सर्वदा सुखदायक हो ॥
२. अलङ्कार --इस मन्त्र में उपमावाचक 'इव' आदि पद लुप्त है, अतः वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है । उपमा यह है कि जैसे राजपुरुष और प्रजा-जन सेनापति को बनाते हैं, वैसे सेनापति भी उनको धारण करे ॥११ । २६ ॥