Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 25

83 Mantra
11/25
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सोमक ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
परि॒ वाज॑पतिः क॒विर॒ग्निर्ह॒व्यान्य॑क्रमीत्। दध॒द् रत्ना॑नि दा॒शुषे॑॥२५॥

परि॑। वाज॑पति॒रिति॒ वाज॑ऽपतिः। क॒विः। अ॒ग्निः। ह॒व्यानि॑। अ॒क्र॒मी॒त्। दध॑त्। रत्ना॑नि। दा॒शुषे॑ ॥२५ ॥

Mantra without Swara
परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत् । दधद्रत्नानि दाशुषे ॥

परि। वाजपतिरिति वाजऽपतिः। कविः। अग्निः। हव्यानि। अक्रमीत्। दधत्। रत्नानि। दाशुषे॥२५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वान्! जो (वाजपतिः) अन्न आदि का रक्षक, (कविः) क्रान्तदर्शी, दानी गृहस्थ पुरुष है वह (दाशुषे) सत्पात्र विद्वान् के लिये (रत्नानि) सुवर्ण आदि द्रव्यों को (दधत्) धारण करता है, वैसे (अग्निः) प्रकाशमान अग्नि (हव्यानि) होम की हुई वस्तुओं को (परि+अक्रमीत्) सर्वत्र पहुँचा देता है, उसे तू जान ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है॥ विद्वान् पुरुष अग्नि के द्वारा पृथिवीस्थ पदार्थों से धन को प्राप्त करके, श्रेष्ठ मार्ग पर चलने वाले सत्पात्रों में दान करके, विद्या के प्रचार से सबको सुख प्रदान करे ॥११ । २५ ॥
Subject
फिर गृहस्थ कैसे होवें, यह उपदेश किया है ॥
Commentary Essence
१. गृहस्थ कैसा हो--गृहस्थ पुरुष अन्न आदि का रक्षक, क्रान्तदर्शी, दाता, दान के पात्र विद्वानों के लिये सुवर्ण आदि रत्नों को धारण करने वाला हो।
२. अग्नि--अग्नि उक्त गृहस्थ पुरुष के तुल्य गुणों वाला है। वह हव्य-पदार्थ को सब ओर पहुँचा देता है। विद्वान् पुरुष उस अग्नि के द्वारा पृथिवीस्थ पदार्थों से धन को प्राप्त करके, धर्म-मार्ग में सत्पात्रों को दान करके विद्या के प्रचार से सबको सुखी रखे ॥
३. अलङ्कार-–इस मन्त्र में उपमा-वाचक 'इव' आदि पद लुप्त है। अतः वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि अग्नि गृहस्थ पुरुष के समान अन्न आदि का रक्षक है। इत्यादि ॥११ । २५ ॥