Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 24

83 Mantra
11/24
Devata- अग्निर्देवता Rishi- गृत्समद ऋषिः Chhand- आर्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ वि॒श्वतः॑ प्र॒त्यञ्चं॑ जिघर्म्यर॒क्षसा॒ मन॑सा॒ तज्जु॑षेत। मर्य्य॑श्री स्पृह॒यद्व॑र्णोऽअ॒ग्निर्नाभि॒मृशे॑ त॒न्वा जर्भु॑राणः॥२४॥

आ। वि॒श्वतः॑। प्र॒त्यञ्च॑म्। जि॒घ॒र्मि॒। अ॒र॒क्षसा॑। मन॑सा। तत्। जु॒षे॒त॒। मर्य्य॑श्रीरिति॒ मर्य्य॑ऽश्रीः। स्पृ॒ह॒यद्व॑र्ण॒ इति॑ स्पृह॒यत्ऽव॑र्णः। अ॒ग्निः। न। अ॒भि॒मृश॒ इत्य॑भि॒ऽमृशे॑। त॒न्वा᳕। जर्भु॑राणः ॥२४ ॥

Mantra without Swara
आ विश्वतः प्रत्यञ्चज्जिघर्म्यरक्षसा मनसा तज्जुषेत । मर्यश्री स्पृहयद्वर्णाऽअग्निर्नाभिमृशे तन्वा जर्भुराणः ॥

आ। विश्वतः। प्रत्यञ्चम्। जिघर्मि। अरक्षसा। मनसा। तत्। जुषेत। मर्य्यश्रीरिति मर्य्यऽश्रीः। स्पृहयद्वर्ण इति स्पृहयत्ऽवर्णः। अग्निः। न। अभिमृश इत्यभिऽमृशे। तन्वा। जर्भुराणः॥२४॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
(न) जैसे (विश्वतः) सब ओर से (अग्निः) शरीरस्थ विद्युत् और वायु (अभिमृशे) मुख्य रूप से सहनशक्ति के लिये हैं, और जैसे (तन्वा) शरीरस्थ वायु से (जर्भुराणः) शरीर के अङ्गों को मरोड़ता हुआ, (स्पृहयद्वर्णः) इच्छुक जनों से स्वीकार किया जाता हुआ, (मर्यश्रीः) मनुष्यों की लक्ष्मी के तुल्य मैं वायु का विज्ञाता, जिस (प्रत्यञ्चम्) शरीरस्थ वायु को (रक्षसा) राक्षसों की दुष्टता से रहित (मनसा) मन से (आ+जिघर्मि) ग्रहण करता हूँ, वैसे (तत्) अग्नि को (जुषेत) मनुष्य सेवन करे ॥११ । २४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमावाचक और लुप्तोपमा अलङ्कार हैं। हे मनुष्यो! तुम लक्ष्मी को प्राप्त कराने वाले अग्नि आदि पदार्थों को जान कर उनका कार्यों में उपयोग करके श्रीमान्=धनवान् बनो ॥११।२४ ॥
Subject
फिर वायु और अग्नि कैसे गुण वाले हैं, इस विषय का उपदेश किया है॥
Refrences
(जर्भुराणः) यहाँ 'जृभी' धातु से उणादि का 'उरानन्' प्रत्यय है ॥ ११ । २४ ॥
Commentary Essence
१. वायु कैसा है--वायु शरीर के प्रत्येक अवयव में विद्यमान है। मनुष्य शरीरस्थ वायु से ही शरीर के अङ्गों को मरोड़ता है। जो वायु का ज्ञाता है उसे वायु-विद्या के अभिलाषी वरण करते हैं, उसे अपना गुरु स्वीकार करते हैं। वायु के गुणों को जानकर और उसे कार्यों में प्रयुक्त करके मनुष्य लक्ष्मी को प्राप्त करता है, अन्य विद्वान् मनुष्यों के समान श्रीमान् हो जाता है। अतः मनुष्य दुष्टता-रहित चित्त से वायु को जाने।
२. अग्नि कैसा है—अग्नि अर्थात् शरीरस्थ विद्युत् और वायु सब ओर से कष्टों को सहन करने की शक्ति प्रदान करते हैं, और अग्नि आदि पदार्थ लक्ष्मी के प्रापक हैं। इनके गुणों को जानकर और इनको कार्यों में संयुक्त करके मनुष्य श्रीमान बनें।
३. अलङ्कार—इस मन्त्र में 'न' पद उपमावाचक है, अतः उपमा अलङ्कार है। और आगे 'यथामर्यश्रीरहं' में वाचक-लुप्तोपमा का भी प्रयोग किया गया है। अतः वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि मनुष्य अग्नि और वायु के समान सहनशील हो। वाचक-लुप्तोपमा में उपमा यह है कि अग्नि और वायु के विज्ञाता विद्वान् के समान अन्य मनुष्य भी अग्नि तथा वायु के गुणों को जानें ॥११ । २४ ॥