Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 22

83 Mantra
11/22
Devata- द्रविणोदा देवता Rishi- मयोभूर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उद॑क्रमीद् द्रविणो॒दा वा॒ज्यर्वाकः॒ सुलो॒कꣳ सुकृ॑तं पृथि॒व्याम्। ततः॑ खनेम सु॒प्रती॑कम॒ग्निꣳ स्वो॒ रुहा॑णा॒ऽअधि॒ नाक॑मुत्त॒मम्॥२२॥

उत्। अ॒क्र॒मी॒त्। द्र॒वि॒णो॒दा इति॑ द्रविणः॒ऽदाः। वा॒जी। अर्वा॑। अक॒रित्यकः॑। सु। लो॒कम्। सुकृ॑त॒मिति॒ सुऽकृ॑तम्। पृ॒थि॒व्याम्। ततः॑। ख॒ने॒म॒। सु॒प्रती॑क॒मिति॑ सु॒ऽप्रती॑कम्। अ॒ग्निम्। स्व᳖ इति॑ स्वः᳖। रुहा॑णाः। अधि॑। नाक॑म्। उ॒त्त॒ममित्यु॑त्ऽत॒मम् ॥२२ ॥

Mantra without Swara
उदक्रमीद्द्रविणोदा वाज्यर्वाकः सु लोकँ सुकृतम्पृथिव्याम् ततः खनेम सुप्रतीकमग्निँ स्वो रुहाणाऽअधि नाकमुत्तमम् ॥

उत्। अक्रमीत्। द्रविणोदा इति द्रविणःऽदाः। वाजी। अर्वा। अकरित्यकः। सु। लोकम्। सुकृतमिति सुऽकृतम्। पृथिव्याम्। ततः। खनेम। सुप्रतीकमिति सुऽप्रतीकम्। अग्निम्। स्व इति स्वः। रुहाणाः। अधि। नाकम्। उत्तममित्युत्ऽतमम्॥२२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे भूगर्भविद्या को जानने वाले विद्वान्! आप (द्रविणोदाः) धन के दाता हो। जैसे (वाजी) वेगवान् (अर्वा) घोड़ा चलता है, वैसे (पृथिव्याम्) पृथिवी में (अधि+उत्+अक्रमीत्) गति कीजिये, भूगर्भविद्या को प्राप्त कीजिये।
और (सुलोकम्) दर्शनीय, (सुकृतम्) धर्माचरण से प्राप्त करने योग्य, (उत्तमम्) अतिश्रेष्ठ, (नाकम्) दुःखरहित स्वर्ग को (अकः) सिद्ध कीजिये, प्राप्त कीजिये।
तत्पश्चात् (स्व:) सुख को (रुहाणाः) प्राप्त करते हुए हम लोग भी (अस्याम्) इस पृथिवी में (सुप्रतीकम्) सुन्दर (अग्निम्) व्यापक विद्युत् को (खनेम) खोजें, प्राप्त करें ॥११ । २२ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है॥ हे मनुष्यो! हम सब मिल कर, जैसे पृथिवी पर घोड़ा चलता है, वैसे पुरुषार्थी होकर पृथिवी आदि की विद्या को प्राप्त करके, दुःखों को लाँघकर--
सर्वोत्तम सुख को प्राप्त करें ॥११ । २२ ॥
Subject
मनुष्य इस संसार में किस के समान हो के किस को प्राप्त करें, यह उपदेश किया है॥
Commentary Essence
१. मनुष्य क्या प्राप्त करें--भूगर्भ विद्या का वेत्ता विद्वान् धन का दाता होता है। जैसे वेगवान् घोड़ा गति करता है, वैसे उक्त विद्वान् पृथिवी में उत्तम रीति से गति करे। जैसे घोड़ा पृथिवी पर गति करता है, वैसे सब लोग मिल कर, पुरुषार्थी होकर पृथिवी आदि की विद्या को प्राप्त करें। धर्माचरण से प्राप्त करने योग्य, अतिश्रेष्ठ, दुःखरहित, उत्तम लोक स्वर्ग को सिद्ध करें अर्थात् दुःखों का उत्क्रमण करके सर्वोत्तम सुख को प्राप्त करें। तत्पश्चात् प्रीतिकारक व्यापक विद्युत् को खोजें॥
२. अलङ्कार—इस मन्त्र में उपमावाचक 'इव' आदि पद लुप्त हैं, अतः वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि जैसे वेगवान् अश्व पृथिवी पर गति करता है, वैसे विद्वान् भूगर्भ में विद्या के द्वारा गतिमान् हो ॥११ । २२ ॥