Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 20

83 Mantra
11/20
Devata- क्षत्रपतिर्देवता Rishi- मयोभूर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
द्यौस्ते॑ पृ॒ष्ठं पृ॑थि॒वी स॒धस्थ॑मा॒त्मान्तरि॑क्षꣳ समु॒द्रो योनिः॑। वि॒ख्याय॒ चक्षु॑षा॒ त्वम॒भि ति॑ष्ठ पृतन्य॒तः॥२०॥

द्यौः। ते॒। पृ॒ष्ठम्। पृ॒थि॒वी। स॒धस्थ॒मिति॑ स॒धऽस्थ॑म्। आ॒त्मा। अ॒न्तरि॑क्षम्। स॒मु॒द्रः। योनिः॑। वि॒ख्यायेति॑ वि॒ऽख्याय॑। चक्षु॑षा। त्वम्। अ॒भि। ति॒ष्ठ॒। पृ॒त॒न्य॒तः ॥२० ॥

Mantra without Swara
द्यौस्ते पृष्ठम्पृथिवी सधस्थमात्मान्तरिक्षँ समुद्रो योनिः । विख्याय चक्षुषा त्वमभि तिष्ठ पृतन्यतः ॥

द्यौः। ते। पृष्ठम्। पृथिवी। सधस्थमिति सधऽस्थम्। आत्मा। अन्तरिक्षम्। समुद्रः। योनिः। विख्यायेति विऽख्याय। चक्षुषा। त्वम्। अभि। तिष्ठ। पृतन्यतः॥२०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वान् राजन् ! जिस (ते) आपका (द्यौः) प्रकाश के समान विनय से युक्त (पृष्ठम्) पिछला व्यवहार है, (पृथिवी) पृथिवी के समान (सधस्थम्) विशाल स्थान है, (अन्तरिक्षम्) आकाश के समान क्षोभरहित (आत्मा) आत्मा है, (समुद्र) सागर के समान गम्भीर (योनिः) प्रयोजन है, सो आप (चक्षुषा) विवेक से (वि+ख्याय) प्रसिद्धि को प्राप्त करके (पृतन्यतः) अपनी सेना के इच्छुक शत्रु-जन का (अभितिष्ठ) सामना कीजिये ॥११ । २० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। जो मनुष्य न्याय-पथ पर चलने वाला, दृढ़ोत्साही, दृढ़-स्थान और दृढात्मा वाला है, और--
जिसके प्रयोजन विवेकसाध्य हैं, उसकी वीरसेना होती है। वह निश्चित विजय करने में समर्थ होता है ॥११ । २० ॥
Subject
मनुष्य क्या सिद्ध करें, इस विषय का उपदेश किया है ॥ ११ । २० ॥
Commentary Essence
१. मनुष्य क्या सिद्ध करे--विद्वान् राजा प्रकाश के समान विनय एवं नम्र व्यवहार वाला हो। दृढ़ उत्साही हो। पृथिवी के समान विशाल स्थान वाला हो। आकाश के समान क्षोभरहित आत्मा वाला हो। समुद्र के समान सबका निमित्त हो। न्याय-पथ का अनुगामी हो। वह अपने प्रयोजन (कार्य) को विवेक-लोचन से सिद्ध करे। जो ऐसा होता है, उसकी सेना वीर होती है। वह शत्रुओं का साम्मुख्य करके ध्रुव विजय को प्राप्त करता है ॥
२. अलङ्कार--मन्त्र में उपमावाचक 'इव' आदि पद लुप्त हैं, अतः वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि राजा द्युलोक (प्रकाश) आदि के गुणों के समान गुणों से विभूषित हो ॥११ । २० ॥