Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 2

83 Mantra
11/2
Devata- सविता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- शङ्कुमती गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यु॒क्तेन॒ मन॑सा व॒यं दे॒वस्य॑ सवि॒तुः स॒वे। स्व॒र्ग्याय॒ शक्त्या॑॥२॥

यु॒क्तेन॑। मन॑सा। व॒यम्। दे॒वस्य॑। स॒वि॒तुः। स॒वे। स्व॒र्ग्या᳖येति॑ स्वः॒ऽग्या᳖य॒। शक्त्या॑ ॥२ ॥

Mantra without Swara
युक्तेन मनसा वयन्देवस्य सवितुः सवे । स्वर्ग्याय शक्त्या ॥

युक्तेन। मनसा। वयम्। देवस्य। सवितुः। सवे। स्वर्ग्यायेति स्वःऽग्याय। शक्त्या॥२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे योग और पदार्थ विद्या के जिज्ञासु मनुष्यो! जैसे (वयम्) हम योगी लोग (युक्तेन) योगाभ्यास से युक्त (मनसा) विज्ञानमय मन से और (शक्त्या) अपने सामर्थ्य से (देवस्य) सबके प्रकाशक (सवितुः) सकल जगत् के उत्पादक जगदीश्वर के (सवे) जगत् में (स्वर्ग्याय) सुख के साधनों की प्राप्ति के लिये (ज्योतिः) आत्मप्रकाश को (आभरेम) धारण करते हैं, वैसे तुम लोग भी धारण करो ॥ ११ । २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। यदि मनुष्य परमेश्वर की सृष्टि में समाधिस्थ होकर योग और तत्त्वविद्या का यथाशक्ति सेवन करें, और--
वे आत्मप्रकाश से युक्त होकर योग और पदार्थ विज्ञान का अभ्यास करें, तो सिद्धियों को कैसे न प्राप्त हों ॥११ । २॥
Subject
योगाभ्यास और भूगर्भविद्या का फिर उपदेश किया है॥
Commentary Essence
१. योग और तत्त्वविद्या--सबके प्रकाशक, सकल जगत् के उत्पादक जगदीश्वर की सृष्टि में जैसे योगी लोग योगाभ्यास से युक्त मन से समाधिस्थ होकर योग का और पदार्थविद्या का सेवन करते हैं और सब सुखों के साधनभूत आत्मज्योति को धारण करते हैं, वैसे योग और तत्त्वविद्या के जिज्ञासु लोग भी आचरण करें तो सिद्धि को क्यों न प्राप्त होवें ॥ ११ । २ ॥
२. अलङ्कार--इस मन्त्र में उपमावाचक 'इव' आदि शब्द लुप्त हैं, अतः वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि योगी जनों के समान योग जिज्ञासु भी योगाभ्यास और पदार्थविद्या को प्राप्त करें ॥११ । २ ॥
Elsewhere Availablity
सब मनुष्य इस प्रकार की इच्छा करें कि (वयम्) हम लोग (स्वर्ग्याय) मोक्ष-सुख के लिए (शक्त्या) यथायोग्य सामर्थ्य के बल से (देवस्य) परमेश्वर की सृष्टि में उपासना योग करके अपने आत्मा को शुद्ध करें कि जिससे (युक्तेन मनसा) अपने शुद्ध मन से परमेश्वर के प्रकाशस्वरूप आनन्द को प्राप्त हों (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका : उपासनाविषय) ॥