Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 18

83 Mantra
11/18
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मयोभूर्ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ॒गत्य॑ वा॒ज्यध्वा॑न॒ꣳ सर्वा॒ मृधो॒ विधू॑नुते। अ॒ग्निꣳ स॒धस्थे॑ मह॒ति चक्षु॑षा॒ निचि॑कीषते॥१८॥

आ॒गत्येत्या॒ऽऽगत्य॑। वा॒जी। अध्वा॑नम्। सर्वाः॑। मृधः॑। वि। धू॒नु॒ते॒। अ॒ग्निम्। स॒धस्थ॒ इति॑ स॒धस्थे॑। म॒ह॒ति। चक्षु॑षा। नि। चि॒की॒ष॒ते॒ ॥१८ ॥

Mantra without Swara
आगत्य वाज्यध्वानँ सर्वा मृधो विधूनुते । अग्निँ सधस्थे महति चक्षुषा नि चिकीषते ॥

आगत्येत्याऽऽगत्य। वाजी। अध्वानम्। सर्वाः। मृधः। वि। धूनुते। अग्निम्। सधस्थ इति सधस्थे। महति। चक्षुषा। नि। चिकीषते॥१८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वान् राजन्! जैसे (वाजी) वेगवान् घोड़ा (अध्वानम्) मार्ग को प्राप्त करके (सर्वाः) सब (मृधः) संग्रामों को (विधूनुते) कंपाता है, और जैसे गृहस्थ पुरुष (चक्षुषा) नेत्र से (महति) विशाल (सधस्थे) निवास-स्थान में (अग्निम्) अग्नि का (नि+चिकीषते) चयन करना चाहता है, वैसे आप सब संग्रामों को कंपाइये और घर-घर में विद्या का चयन कीजिये ॥११ । १८ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुतोपमा अलङ्कार है। गृहस्थ लोग अश्व के समान गमन-आगमन करके, शत्रुओं को जीतकर, आग्नेयास्त्र-विद्या को सिद्ध करके, अपने बल और निर्बलता को देखकर, राग-द्वेष आदि को शान्त करके, अधर्मी शत्रुओं को जीतें ॥११ । १८ ॥
Subject
अब सभापति राजा किस के समान क्या करे, यह उपदेश किया है ॥
Commentary Essence
१. सभापति राजा क्या करे—जैसे वेगवान् घोड़ा मार्ग को प्राप्त करके सङ्ग्रामों को कम्पित करता है, वैसे सभापति राजा आग्नेयास्त्र-विद्या को सिद्ध करके, अपने बल-अबल को भली-भाँति देखकर, राग द्वेष आदि दोषों को शान्त करके, अधार्मिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें। जैसे गृहस्थ लोग अपने विशाल घर में चक्षु की सहायता से अग्नि का चयन करते हैं, वैसे सभापति विद्वान् राजा घर-घर में विद्या का चयन करे, विद्या का प्रचार करे ॥
२. अलङ्कार--इस मन्त्र में उपमावाचक 'इव' आदि पद लुप्त हैं, अतः वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि सभापति राजा अश्व के समान वेगवान् होकर सङ्ग्रामों को कम्पित करे एवं शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे। घर में गृहस्थों के अग्नि चयन के समान घर-घर में विद्या का प्रचार करे ॥११ । १८ ॥