Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 16

83 Mantra
11/16
Devata- अग्निर्देवता Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
पृ॒थि॒व्याः स॒धस्था॑द॒ग्निं पु॑री॒ष्यमङ्गिर॒स्वदाभ॑रा॒ग्निं पु॑री॒ष्यमङ्गिर॒स्वदच्छे॑मो॒ऽग्निं पु॑री॒ष्यमङ्गिर॒स्वद्भ॑रिष्यामः॥१६॥

पृ॒थि॒व्याः। स॒धस्था॒दिति॑ स॒धऽस्था॑त्। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳖म्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। आ। भ॒र॒। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳖म्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। अच्छ॑। इ॒मः॒। अ॒ग्निम्। पु॒री॒ष्य᳖म्। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। भ॒रि॒ष्या॒मः॒ ॥१६ ॥

Mantra without Swara
पृथिव्याः सधस्थादग्निम्पुरीष्यमङ्गिरस्वदाभराग्निम्पुरीष्यमङ्गिरस्वदच्छेमोग्निम्पुरीष्यमङ्गिरस्वद्भरिष्यामः ॥

पृथिव्याः। सधस्थादिति सधऽस्थात्। अग्निम्। पुरीष्यम्। अङ्गिरस्वत्। आ। भर। अग्निम्। पुरीष्यम्। अङ्गिरस्वत्। अच्छ। इमः। अग्निम्। पुरीष्यम्। अङ्गिरस्वत्। भरिष्यामः॥१६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वान् ! जैसे हम लोग (पृथिव्याः) भूमि वा आकाश के (सधस्थात्) स्थान से (अङ्गिरस्वत्) सूर्य के समान, (पुरीष्यम्) सुख से परिपूर्ण करने वाली, (अग्निम्) स्थूल वा विद्युत् रूप अग्नि को (अच्छ) उत्तम रीति से (इम:) प्राप्त करते हैं, और जैसे (अङ्गिरस्वत्) सूर्य के तुल्य, (पुरीष्यम्) सुख से परिपूर्ण करने वाली, (अग्निम्) स्थूल वा विद्युत् रूप अग्नि को (भरिष्यामः) ग्रहण करेंगे, वैसे आप भी (अङ्गिरस्वत्) सूर्य के तुल्य, (पुरीष्यम्) सुख से परिपूर्ण करने वाली, (अग्निम्) अन्तरिक्ष वा वायु आदि में विद्यमान विद्युत् को (आ+भर) धारण करो, पकड़ो ॥११ । १६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार हैं॥ मनुष्य विद्वानों का ही अनुकरण करें; अविद्वानों का नहीं। और सर्वदा उत्साह से अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को ग्रहण करके सुख को बढ़ावें ॥११ । १६ ॥
Subject
मनुष्य किस पदार्थ से बिजुली को ग्रहण करें, यह उपदेश किया है ॥
Commentary Essence
१. मनुष्य किस पदार्थ से विद्युत् को ग्रहण करें—मनुष्य भूमि वा अन्तरिक्ष से सूर्य के समान देदीप्यमान, सुख से परिपूर्ण करने वाली अग्नि=विद्युत् को अच्छी प्रकार से प्राप्त करें। मनुष्य सदा विद्वानों का ही अनुकरण करें, मूर्खों का नहीं। वे सदा उत्साह से अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को ग्रहण करके सुख को बढ़ावें॥
२. अलङ्कार--इस मन्त्र में 'अङ्गिरस्वत्' पद में उपमावाचक 'वत्' पद होने से उपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि अग्नि=विद्युत् सूर्य के समान देदीप्यमान है। यहाँ उपमावाचक पद लुप्त होने से वाचकलुतोपमा अलङ्कार भी है। उपमा यह है कि मनुष्य श्रेष्ठ विद्वानों के समान अग्नि (विद्युत्) आदि पदार्थ विद्या को ग्रहण करें ॥११ । १६॥