Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 15

83 Mantra
11/15
Devata- गणपतिर्देवता Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- आर्षी Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्र॒तूर्व॒न्नेह्य॑व॒क्राम॒न्नश॑स्ती रु॒द्रस्य॒ गाण॑पत्यं मयो॒भूरेहि॑। उ॒र्वन्तरि॑क्षं॒ वीहि स्व॒स्तिग॑व्यूति॒रभ॑यानि कृ॒ण्वन् पू॒ष्णा स॒युजा॑ स॒ह॥१५॥

प्र॒तूर्व॒न्निति॑ प्र॒ऽतूर्व॑न्। आ। इ॒हि॒। अ॒व॒क्राम॒न्नित्य॑व॒ऽक्राम॑न्। अश॑स्तीः। रु॒द्रस्य॑। गाण॑पत्य॒मिति॒ गाण॑ऽपत्यम्। म॒यो॒भूरिति॑ मयः॒ऽभूः। आ। इ॒हि॒। उ॒रु। अ॒न्तरि॑क्षम्। वि। इ॒हि॒। स्व॒स्तिग॑व्यूति॒रिति॑ स्व॒स्तिऽग॑व्यूतिः। अभ॑यानि। कृ॒ण्वन्। पू॒ष्णा। स॒युजेति॑ स॒ऽयुजा॑। स॒ह ॥१५ ॥

Mantra without Swara
प्रतूर्वन्नेह्यवक्रामन्नशस्तो रुद्रस्य गाणपत्यम्मयोभूरेहि । उर्वन्तरिक्षँवीहि स्वस्तिगव्यूतिरभयानि कृण्वन्पूष्णा सयुजा सह ॥

प्रतूर्वन्निति प्रऽतूर्वन्। आ। इहि। अवक्रामन्नित्यवऽक्रामन्। अशस्तीः। रुद्रस्य। गाणपत्यमिति गाणऽपत्यम्। मयोभूरिति मयःऽभूः। आ। इहि। उरु। अन्तरिक्षम्। वि। इहि। स्वस्तिगव्यूतिरिति स्वस्तिऽगव्यूतिः। अभयानि। कृण्वन्। पूष्णा। सयुजेति सऽयुजा। सह॥१५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे राजन् ! (स्वस्तिगव्यूतिः) सुख से युक्त मार्ग वाले आप--(सयुजा) एक साथ संयुक्त होने वाले (पूष्णा) अपने बलवान् सेनावृन्द (सह) के सहाय से (अशस्तीः) निन्दित शत्रु सेनाओं को (प्रतूर्वन्) मारते हुये (आ+इहि) आइए।
शत्रु के देश-देशान्तरों को (अवक्रामन्) लांघते हुए (आ+इहि) आइए।
(मयोभूः) सुख को उत्पन्न करने वाले आप (रुद्रस्य) शत्रु को रुलाने वाले (गाणपत्यम्) सेनापतित्व को (आ+इहि) प्राप्त कीजिए ।
(अभयानि) अपने राज्य में और सेना में निर्भयता को (कृण्वन्) उत्पन्न करके (अन्तरिक्षम्) आकाश में (उरु) बहुत (वि+इहि) नाना गति कीजिये ॥११ । १५ ॥
Essence
राजा सदा अपनी सेना को सुशिक्षित और हृष्ट-पुष्ट रखे। जब शत्रुओं से युद्ध करना चाहे तब अपने राज्य को उपद्रवों से रहित करके युक्ति और बल से शत्रुओं का हिंसन करे,
अथवा श्रेष्ठों का पालन करके सर्वत्र सत्कीर्ति को फैलावे ॥११ । १५ ॥
Subject
फिर राजा क्या करके किस को प्राप्त करे, यह उपदेश किया है॥
Commentary Essence
राजा क्या करे--राजा का मार्ग सुख से युक्त हो अर्थात् वह सुख के मार्ग पर चले। वह अपनी सेना को सदा सुशिक्षित तथा हृष्ट-पुष्ट रखे। और सेना के साथ स्वयं भी समानरूप से संयुक्त रहे। जब शत्रुओं के साथ युद्ध करने की इच्छा करे तब अपने राज्य को उपद्रव-रहित करके युक्ति और बल (सेना) से निन्दनीय शत्रुसेना का हिंसन करे। शत्रु के देश-देशान्तरों को लांघकर उनको अपने वश में करे। सुख-दाता होकर रुद्र अर्थात् शत्रु को रुलाने वाले अपने सेनापतियों का गणपति बने। अपने राज्य और सेना को निर्भय रखे। श्रेष्ठों का पालन करके सर्वत्र अपनी सत्कीर्ति का प्रसार करे। विमान आदि से अन्तरिक्ष में गमन करे ॥११ । १५ ॥