Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 12

83 Mantra
11/12
Devata- वाजी देवता Rishi- नाभानेदिष्ठ ऋषिः Chhand- आस्तारपङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्रतू॑र्त्तं वाजि॒न्नाद्र॑व॒ वरि॑ष्ठा॒मनु॑ सं॒वत॑म्। दि॒वि ते॒ जन्म॑ पर॒मम॒न्तरि॑क्षे॒ तव॒ नाभिः॑ पृथि॒व्यामधि॒ योनि॒रित्॥१२॥

प्रतू॑र्त्त॒मिति॒ प्रऽतू॑र्त्तम्। वा॒जि॒न्। आ। द्र॒व॒। वरि॑ष्ठाम्। अनु॑। सं॒वत॒मिति॑ स॒म्ऽवत॑म्। दि॒वि। ते॒। जन्म॑। प॒र॒मम्। अ॒न्तरि॑क्षे। तव॑। नाभिः॑। पृ॒थि॒व्याम्। अधि॑। योनिः॑। इत् ॥१२ ॥

Mantra without Swara
प्रतूर्तँवाजिन्नाद्रव वरिष्ठामनु सँवतम् । दिवि ते जन्म परममन्तरिक्षे तव नाभिः पृथिव्यामधि योनिरित् ॥

प्रतूर्त्तमिति प्रऽतूर्त्तम्। वाजिन्। आ। द्रव। वरिष्ठाम्। अनु। संवतमिति सम्ऽवतम्। दिवि। ते। जन्म। परमम्। अन्तरिक्षे। तव। नाभिः। पृथिव्याम्। अधि। योनिः। इत्॥१२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (वाजिन्) प्रशंसनीय ज्ञान वाले विद्वान्! जिस (ते) आपका शिल्प-विद्या के द्वारा (दिवि) सूर्य के प्रकाश में (परमं जन्म) अत्यन्त प्रादुर्भाव है, आपकी (अन्तरिक्षे) आकाश में (नाभिः) नाभि है, (पृथिव्याम्) पृथिवी पर (योनिः) प्रयोजन है, सो आप विमानों में [अधि] बैठकर (वरिष्ठाम्) अत्यन्त श्रेष्ठ (संवतम्) उत्तम रीति से विभक्त (प्रतूर्तम्) तीव्र गति से (इत्) ही (अनु+आ+द्रव) आइये ॥११ । १२ ॥
Essence
जब मनुष्य विद्या और हस्तक्रिया में परम प्रयत्न से प्रवृत्त होकर--
विमान आदि यानों को बनाकर शीघ्र यातायात करते हैं तब उन्हें धन सुलभ होता है ॥११ । १२ ॥
Subject
मनुष्य भूमि आदि से सुवर्ण आदि पदार्थों को कैसे प्राप्त करें, इसका फिर उपदेश किया है॥
Commentary Essence
पृथिवी आदि से सुवर्ण आदि की प्राप्ति--प्रशस्त ज्ञानवान् विद्वान् शिल्पविद्या के द्वारा सूर्य के प्रकाश में (द्युलोक में) प्रकट हो सकता है, अन्तरिक्ष में नाभि के तुल्य अपना केन्द्र बना सकता है, पृथिवी पर अपने सब प्रयोजनों को सिद्ध कर सकता है। अतः शिल्प-विद्या का वेत्ता विद्वान् विद्या और हस्त-कर्म के द्वारा बड़े पुरुषार्थ से शिल्प-विद्या में प्रवृत्त होकर विमान आदि यानों की रचना करे और उनमें बैठकर अत्यन्त श्रेष्ठ, संविभक्त और अति तीव्र गति से देशान्तर में गमन-आगमन करके सुवर्ण आदि धन को प्राप्त करे ॥११ । १२ ॥