Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 1

83 Mantra
11/1
Devata- सविता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- विराडार्ष्यनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यु॒ञ्जा॒नः प्र॑थ॒मं मन॑स्त॒त्त्वाय॑ सवि॒ता धियः॑। अ॒ग्नेर्ज्योति॑र्नि॒चाय्य॑ पृथि॒व्याऽअध्याभ॑रत्॥१॥

यु॒ञ्जा॒नः। प्र॒थ॒मम्। मनः॑। त॒त्त्वाय॑। स॒वि॒ता। धियः॑। अ॒ग्नेः। ज्योतिः॑। नि॒चाय्येति॑ नि॒चाऽय्य॑। पृ॒थि॒व्याः। अधि॑। आ। अ॒भ॒र॒त् ॥१ ॥

Mantra without Swara
युञ्जानः प्रथमम्मनस्तत्वाय सविता धियः । अग्नेर्ज्यातिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत् ॥

युञ्जानः। प्रथमम्। मनः। तत्त्वाय। सविता। धियः। अग्नेः। ज्योतिः। निचाय्येति निचाऽय्य। पृथिव्याः। अधि। आ। अभरत्॥१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
जो (सविता) ऐश्वर्य की कामना करने वाला मनुष्य (तत्त्वाय) परमेश्वर आदि पदार्थों के विज्ञान के लिये (प्रथमम् ) आदि में (मनः) मननात्मक अन्तःकरण की वृत्ति को और (धियः) धारणात्मक अन्तःकरण की वृत्तियों को (युञ्जानः) योगाभ्यास और भूगर्भविद्या में युक्त करता हुआ, (अग्नेः) पृथिवी आदि में विद्यमान विद्युत् के (ज्योतिः) प्रकाश को (निचाय्य) निश्चित जानकर (पृथिव्याः) भूमि को (अधि+आ+भरत्) सब ओर से धारण करे, वह पदार्थविद्या और योगविद्या का ज्ञाता होवे।
Essence
जो पुरुष योगविद्या और भूगर्भ विद्या को प्राप्त करना चाहे, वह यम आदि और क्रियाकौशलों से अन्तःकरण को पवित्र करके, तत्त्वों के विज्ञान के लिये बुद्धि को लगाकर, और इन्हें गुण, कर्म, स्वभाव से जानकर इनका उपयोग करे।
फिर--जो प्रकाशमान सूर्य आदि पदार्थों का प्रकाशक ब्रह्म है, उसे जानकर, उसका अपनी आत्मा में निश्चय करके अपने प्रयोजनों को सिद्ध करे ॥११ । १ ॥
Subject
इसके प्रथम मन्त्र में योगाभ्यास और भूगर्भविद्या का उपदेश किया है ॥
Commentary Essence
योगाभ्यास और भूगर्भविद्या--ऐश्वर्य की कामना करने वाला मनुष्य परमेश्वर आदि पदार्थों के तत्त्व ज्ञान के लिये आदि में मन और बुद्धि को योगाभ्यास और भूगर्भविद्या में लगावे। यम आदि के पालन से मन को और क्रियाकौशल से बुद्धि को शुद्ध करे। परमेश्वर आदि पदार्थों के गुण, कर्म, स्वभाव को जान कर इनका जीवन-व्यवहार में उपयोग करे। और जो सूर्य आदि प्रकाशमान पदार्थों का भी प्रकाशक ब्रह्म है, उसे जान कर अपनी आत्मा में निश्चय करके अपने उद्देश्यों को सिद्ध करे। और जो पृथिवी आदि में विद्यमान विद्युत् है, उसे जानकर पृथिवी को सब ओर से धारण करे अर्थात् भूगर्भविद्या को जानकर पृथिवी आदि से उपयोग ग्रहण करे ॥ ११ । १ ॥
Elsewhere Availablity
(युञ्जानः) योग को करने वाले मनुष्य (तत्त्वाय) तत्त्व अर्थात् ब्रह्म-ज्ञान के लिये (प्रथमं मनः) जब अपने मन को पहिले परमेश्वर में युक्त करते हैं, तब (सविता) परमेश्वर उन की (धियम्) बुद्धि को अपनी कृपा से अपने में युक्त कर लेता है। (अग्नेर्ज्यो०) फिर वे परमेश्वर के प्रकाश को निश्चय कर के (अध्याभरत्) यथावत् धारण करते हैं, (पृथिव्याः) पृथिवी के बीच में योगी का यही प्रसिद्ध लक्षण है (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका उपासनाविषय) ॥