Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 9

34 Mantra
10/9
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- भूरिक अष्टि, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ॒विर्म॑र्या॒ऽआवि॑त्तोऽअ॒ग्निर्गृ॒हप॑ति॒रावि॑त्त॒ऽइन्द्रो॑ वृ॒द्धश्र॑वा॒ऽआवि॑त्तौ मि॒त्रावरु॑णौ धृतव्र॑ता॒वावि॑त्तः पू॒षा वि॒श्ववे॑दा॒ऽआवि॑त्ते॒ द्यावा॑पृथि॒वी वि॒श्वश॑म्भुवा॒वावि॒त्तादि॑तिरु॒रुश॑र्मा॥९॥

आ॒विः। म॒र्य्याः॒। आवि॑त्त॒ इत्याऽवि॑त्तः। अ॒ग्निः। गृ॒हप॑ति॒रिति॑ गृ॒हऽप॑तिः। आवि॑त्त॒ इत्याऽवि॑त्तः। इन्द्रः॑। वृ॒द्धश्र॑वा॒ इति॑ वृ॒द्धऽश्र॑वाः। आवि॑त्ता॒वित्याऽवित्तौ। मि॒त्रावरु॑णौ। धृ॒तव्र॑ता॒विति॑ धृ॒तऽव्र॑तौ। आवि॑त्त॒ इत्याऽवि॑त्तः। पू॒षा। वि॒श्ववे॑दा॒ इति॑ वि॒श्वऽवे॑दाः। आवि॑त्ते॒ इत्याऽवि॑त्ते। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावा॑ऽपृथि॒वी। वि॒श्वश॑म्भुवा॒विति॑ वि॒श्वऽश॑म्भुवौ। आवि॒त्तेत्याऽवि॑त्ता। अदि॑तिः। उ॒रुश॒र्म्मेत्यु॒रुऽश॑र्म्मा ॥९॥

Mantra without Swara
आविर्मयाऽआवित्तोऽअग्निर्गृहपतिरावित्तऽइन्द्रो वृद्धश्रवाऽआवित्तौ मित्रावरुणौ धृतव्रतावावित्तः पूषा विश्ववेदाऽआवित्ते द्यावापृथिवी विश्वशम्भुवावावित्तादितिरुरुशर्मा ॥

आविः। मर्य्याः। आवित्त इत्याऽवित्तः। अग्निः। गृहपतिरिति गृहऽपतिः। आवित्त इत्याऽवित्तः। इन्द्रः। वृद्धश्रवा इति वृद्धऽश्रवाः। आवित्तावित्याऽवित्तौ। मित्रावरुणौ। धृतव्रताविति धृतऽव्रतौ। आवित्त इत्याऽवित्तः। पूषा। विश्ववेदा इति विश्वऽवेदाः। आवित्ते इत्याऽवित्ते। द्यावापृथिवीऽइति द्यावाऽपृथिवी। विश्वशम्भुवाविति विश्वऽशम्भुवौ। आवित्तेत्याऽवित्ता। अदितिः। उरुशर्म्मेत्युरुऽशर्म्मा॥९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (मर्य्याः) मनुष्यो ! यदि (गृहपतिः) गृहस्थ (अग्निः) विद्वान् पुरुष (आविरावित्तः) प्रकट रूप में पूर्ण भोगों को तथा प्रसिद्धि को प्राप्त करने वाला (वृद्धश्रवाः) सब शास्त्रों का श्रवण करने वाला विद्यावृद्ध (इन्द्रः) शत्रुओं का विदारण करने वाला सेनापति (आविरावित्तः) प्रकट रूप में पूर्ण भोगों तथा प्रसिद्धि को प्राप्त करने वाला, (धृतव्रतौ) सत्यभाषण आदि व्रतों को धारण करने वाले (मित्रावरुणौ) दो श्रेष्ठ मित्र (आविरावित्तौ) प्रकट रूप में पूर्ण भोगों को तथा प्रसिद्धि को प्राप्त करने वाले, (विश्ववेदाः) सब औषधों का वेत्ता (पूषा) वैद्य (आविरावित्तः) प्रकट रूप में पूर्ण भोगों को तथा प्रसिद्धि को प्राप्त करने वाला, (विश्वशम्भुवौ) विश्व के लिये सुख के हेतु (द्यावापृथिवी) विद्युत् और भूमि (आविरावित्ते) प्रकट रूप में पूर्ण भोगों तथा प्रसिद्धि को प्राप्त कराने वाले और (उरुशर्मा) नाना सुखों वाली (अदितिः) विदुषी माता (आविरावित्ता) प्रकट रूप में पूर्ण भोगों तथा प्रसिद्धि को प्राप्त करने वाली होवे तो तुम लोग सुखों को प्राप्त कर सकते हो ।। १० । ९।।
Essence
जब तक मनुष्य श्रेष्ठ विद्वानों, श्रेष्ठ विदुषी माता और सत्य पदार्थ विज्ञान को प्राप्त नहीं होते हैं तब तक वे सुख की वृद्धि और दुःख की निवृत्ति नहीं कर सकते ।। १० । ९।।
Subject
मनुष्यों को चाहिये कि सुशीलता से करके आप्त विद्वान् आदि श्रेष्ठ पुरुषों को अवश्य प्राप्त होवें, इस विषय का उपदेश किया है ।।
Refrences
(मर्य्या:) यह शब्द निघं ० ( २ । ३) में मनुष्य-नामों में पढ़ा है। (आवित्तः) 'वित्त' शब्द 'वित्तो भोगप्रत्यययोः’ (अ० ८ । २ । ५८) इस सूत्र से निपातित है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ३ । ५ । ३१-३७) में की गई है ।। १० । ९।।
Commentary Essence
आप्त विद्वानों आदि को अवश्य प्राप्त करें--सब मनुष्यों को उचित है कि वे सुशीलता से गृहस्थ, अग्नि के समान अविद्या अन्धकार को नष्ट करने वाले आप्त विद्वानों को प्राप्त करें अर्थात् उन्हें पूर्ण भोग्य पदार्थ प्रदान करें, उनकी लोक में प्रसिद्धि करें। इसी प्रकार, सब शास्त्रों का श्रवण करने वाले विद्यावृद्ध, शत्रु विदारक सेनापति को, सत्य भाषण आदि व्रतों को धारण करने वाले श्रेष्ठ मित्रों को, सब औषधों के ज्ञाता वैद्यों को, पूर्ण भोग्य पदार्थ प्रदान करें तथा उनकी लोक में प्रसिद्धि करें। विद्युत्, भूमि आदि सब सत्य पदार्थों का विज्ञान प्राप्त करें, इनसे पूर्ण भोगों को प्राप्त करें, इनके गुणों की लोक में प्रसिद्धि करें। नाना सुखों से भरपूर विदुषी माता को पूर्ण भोग्य पदार्थ प्रदान करें तथा उसकी सर्वत्र कीर्ति का विस्तार करें।
जब तक मनुष्य इन आप्त विद्वानों तथा विदुषी माता आदि की सेवा और स्तुति नहीं करते और विद्युत् तथा भूमि आदि सत्य पदार्थों का विज्ञान प्राप्त नहीं करते, तब तक सुखों की वृद्धि और दुःखों की निवृत्ति कदापि नहीं कर सकते ।। १० । ९॥