Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 7

34 Mantra
10/7
Devata- वरुणो देवता Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- विराट् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒ध॒मादो॑ द्यु॒म्निनी॒राप॑ऽए॒ताऽअना॑धृष्टाऽअप॒स्यो वसा॑नाः। प॒स्त्यासु चक्रे॒ वरु॑णः स॒धस्थ॑मपा शिशु॑र्मा॒तृत॑मास्व॒न्तः॥७॥

स॒ध॒माद॒ इति॑ सध॒ऽमादः॑। द्यु॒म्निनीः॑। आपः॑। ए॒ताः। अना॑धृष्टाः। अ॒प॒स्यः᳕। वसा॑नाः। प॒स्त्या᳖सु। च॒क्रे॒। वरु॑णः। स॒धस्थ॒मिति॑ स॒धऽस्थ॑म्। अ॒पाम्। शिशुः॑। मा॒तृत॑मा॒स्विति॑ मा॒तृऽत॑मासु। अ॒न्तरित्य॒न्तः ॥७॥

Mantra without Swara
सधमादो द्युम्निनीरापऽएताऽअनाधृष्टाऽअपस्यो वसानाः । पस्त्यासु चक्रे वरुणः सधस्थमपाँ शिशुर्मातृतमास्वन्तः ॥

सधमाद इति सधऽमादः। द्युम्निनीः। आपः। एताः। अनाधृष्टाः। अपस्यः। वसानाः। पस्त्यासु। चक्रे। वरुणः। सधस्थमिति सधऽस्थम्। अपाम्। शिशुः। मातृतमास्विति मातृऽतमासु। अन्तरित्यन्तः॥७॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
जो (वरुण:) श्रेष्ठ राजा हो, वह (एताः) विद्या और सुशिक्षा को प्राप्त (सधमादः) साथ हर्षित रहने वाली, (धुम्निनीः) प्रशस्त धन वा यश वाली, (अनाधृष्टाः) पराजित न होने वाली, (आपः) जल के समान शान्त (वसानाः) वस्त्र और आभूषणों को धारण करने वाली, विदुषी स्त्रियाँ (पस्त्यासु) घरों में (अपस्यः) उत्तम कर्म करने वाली हों। उन (अपाम्) विद्या को प्राप्त स्त्रियों के जो (शिशुः) बालक हों, उन्हें (मतृतमासु) शास्त्रोक्त शिक्षा से अत्यन्त मान करने वाली धाइयों के (अन्तः) पास (साधस्थम्) निकटवर्ती स्थान में शिक्षा के लिये [चक्रे] रखे ।। १० । ७ ।।
Essence
राजा प्रयत्न से अपने राज्य में सब स्त्रियों को विदुषी करे, उनसे उत्पन्न बालकों को विद्या से युक्त धाइयों के अधीन करे, जिससे किसी का बालक विद्या और सुशिक्षा से हीन न हो और स्त्री निर्बल न हो ।। १० । ७ ।।
Subject
राजाओं को यह अवश्य चाहिये कि वे सब प्रजा और अपने कुल के बालकों को ब्रह्मचर्य से विद्या और सुशिक्षा से युक्त करें, यह उपदेश किया है ।।
Refrences
(अपस्यः) यहां 'सुपां सुलुक्' [अ० ७ । १ । ३९] इस सूत्र से 'शस्' के स्थान में 'सु' है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ३ । ५ । १९) में की गई है ।। १० । ७ ।।
Commentary Essence
१. राजा और विद्या-सुशिक्षा--श्रेष्ठ राजाओं के लिये यह आवश्यक है कि वे प्रयत्न से अपने राज्य में स्त्रियों को विदुषी बनावें, समस्त प्रजा के तथा अपने कुल के भी बालकों को विद्यावती धाइयों के अधीन करके उन्हें विद्या और सुशिक्षा से युक्त करें, जिससे किसी की सन्तान विद्या और सुशिक्षा से रहित न रहे और स्त्रियाँ निर्बल न हों।
२. विदुषी स्त्रियाँ--विद्या और सुशिक्षा को प्राप्त हुई, अपने पतियों के साथ सदा हर्षित रहने वाली, उत्तम धन और यश वाली, किसी से पराजित न होने वाली, जल के समान शान्त स्वभाव वाली, वस्त्र और आभूषणों को धारण करने वाली, गृहकार्यों में कुशल विदुषी स्त्रियाँ हों ।। १० । ७ ।।