Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 6

34 Mantra
10/6
Devata- आपो देवताः Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- स्वराट ब्राह्मी बृहती, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
प॒वित्रे॑ स्थो वैष्ण॒व्यौ सविर्तुवः॑ प्रस॒वऽउत्पु॑ना॒म्यच्छि॑द्रेण प॒वित्रे॑ण॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॑। अनि॑भृष्टमसि वा॒चो बन्धु॑स्तपो॒जाः सोम॑स्य दा॒त्रम॑सि॒ स्वाहा॑ राज॒स्वः॥६॥

प॒वित्रे॒ऽइति॑ प॒वित्रे॑। स्थः॒। वै॒ष्ण॒व्यौ᳖। स॒वि॒तुः। वः॒। प्र॒स॒व इति॑ प्रऽस॒वे। उत्। पु॒ना॒मि॒। अच्छि॑द्रेण। प॒वित्रे॑ण। सूर्य॑स्य। र॒श्मिभि॒रिति॑ र॒श्मिऽभिः॑। अनि॑भृष्ट॒मित्यनि॑ऽभृष्टम्। अ॒सि॒। वा॒चः। बन्धुः॑। त॒पो॒जा इति॑ तपः॒ऽजाः। सोम॑स्य। दा॒त्रम्। अ॒सि॒। स्वाहा॑। रा॒ज॒स्व᳖ इति॑ राज॒ऽस्वः᳖ ॥६॥

Mantra without Swara
पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव ऽउत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः । अनिभृष्टमसि वाचो बन्धुस्तपोजाः सोमस्य दात्रमसि स्वाहा राजस्वः ॥

पवित्रेऽइति पवित्रे। स्थः। वैष्णव्यौ। सवितुः। वः। प्रसव इति प्रऽसवे। उत्। पुनामि। अच्छिद्रेण। पवित्रेण। सूर्यस्य। रश्मिभिरिति रश्मिऽभिः। अनिभृष्टमित्यनिऽभृष्टम्। असि। वाचः। बन्धुः। तपोजा इति तपःऽजाः। सोमस्य। दात्रम्। असि। स्वाहा। राजस्व इति राजऽस्वः॥६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे सभापति राजन् ! क्योंकि आप (वाच:) वेदवाणी के (अनिभृष्टम्) भ्रष्ट पापाचरण से रहित (बन्धुः) भ्राता (असि) हो, (सोमस्य) औषधियों के सेवन से (दात्रम्) रोगों का निवारण करने वाले तथा (तपोजाः) ब्रह्मचर्य आदि तप से युक्त (असि) हो, आपकी आज्ञा से (सवितुः) सकल जगत् के उत्पादक ईश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये इस जगत् में (वैष्णव्यौ) सकल विद्या, उत्तम शिक्षा और शुभ गुण, कर्म, स्वभाव को प्राप्त करने वाले कुमार और कुमारी (पवित्रे) शुद्ध आचरण वाले (स्थः) हों।
हे अध्यापिकाओं की सेविकाओ और अध्ययन करने वाली स्त्रियो ! जैसे मैं राजा, (सवितुः) ईश्वर के (प्रसवे) जगत् में (सूर्यस्य) सूर्य की किरणों के समान (अच्छिद्रेण) निरन्तर (पवित्रेण) विद्या, सुशिक्षा, जितेन्द्रियता, ब्रह्मचर्य आदि पवित्रकारक व्यवहार से (व:) तुम ब्रह्मचारिणी विद्या अभिलाषिणी कुमारियों को (उत्पुनामि) उत्तम रीति से पवित्र करता है, वैसे तुम भी (स्वाहा) सत्याचरण से (राजस्वः) वीर राजाओं को उत्पन्न करने वाली बनो ॥ १०। ६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है॥ हे राजा आदि राजपुरुषो! तुम लोग--इस जगत् में जैसे कुमारों के पढ़ाने में श्रेष्ठ जनों को नियुक्त करते हो, वैसे पवित्र आचरण वाली विद्या की परीक्षक स्त्रियों को कन्याओं के पाने में नियुक्त करो, जिससे यह कुमार और कुमारियाँ विद्या और सुशिक्षा को प्राप्त करके, युवती होकर अपने सदृश, प्रिय, वर, पुरुषों के साथ स्वयंवर विवाह करके वीर पुरुषों को उत्पन्न करें ।। १० । ६ ।।
Subject
जैसे कुमार ब्रह्मचर्य से विद्या ग्रहण करें वैसे कुमारियाँ भी पढ़ें, इस विषय का उपदेश किया है ।।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५।३।५।१६-१८) में की गई है ।। १० । ६ ।।
Commentary Essence
१. कुमारों के समान कुमारियाँ भी ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ें--भ्रष्टाचरण से रहित सभापति राजा वेदवाणी का बन्धु होता है। वह औषधियों के तुल्य सब रोगों का निवारण करता है। ब्रह्मचर्य आदि तप से पवित्र होता है। वह अपनी आज्ञा से इस ईश्वर के जगत् में जैसे कुमारों की शिक्षा के लिये श्रेष्ठ जनों को नियुक्त करे वैसे सकल विद्या, सुशिक्षा तथा शुभ गुण, कर्म, स्वभाव से युक्त पवित्र आचरण वाली, विद्या की परीक्षक स्त्रियों को कन्याओं की शिक्षा के लिए नियुक्त करे।
अपनी अध्यापिकाओं की सेवा करने वाली, विद्या की अभिलाषिणी कुमारियों को इस जगत् में राजा, जैसे सूर्य की किरणें पदार्थों को पवित्र करती हैं, वैसे निरन्तर विद्या, सुशिक्षा, जितेन्द्रियता, ब्रह्मचर्य आदि पवित्रताकारक व्यवहार के उपदेश से पवित्र करे। और ये कुमारियाँ विद्या और सुशिक्षा को प्राप्त कर, युवती होकर, अपने सदृश प्रिय वरों के साथ स्वयंवर विवाह करके वीर पुरुषों को जन्म दें।।
२. अलङ्कार – इस मन्त्र में उपमावाचक 'इव' आदि शब्द लुप्त है अतः वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि राजा कुमारों के समान कुमारियों के भी अध्ययन की व्यवस्था करें ।। १० । ६ ।।