Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 5

34 Mantra
10/5
Devata- अग्न्यादयो मन्त्रोक्ता देवताः Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- स्वराट धृति, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
सोम॑स्य॒ त्विषि॑रसि॒ तवे॑व मे॒ त्विषि॑भूर्यात्। अ॒ग्नये॒ स्वाहा॒ सोमा॑य॒ स्वाहा॑ सवि॒त्रे स्वाहा॒ सर॑स्वत्यै॒ स्वाहा॑ पू॒ष्णे स्वाहा॒ बृह॒स्पत॑ये॒ स्वाहेन्द्रा॑य॒ स्वाहा॒ घोषा॑य॒ स्वाहा॒ श्लोक॑ाय॒ स्वाहाशा॑य॒ स्वाहा॒ भगा॑य॒ स्वाहा॑र्य॒म्णे स्वाहा॑॥५॥

सोम॑स्य। त्विषिः॑। अ॒सि॒। तवे॒वेति तव॑ऽइव। मे॒। त्विषिः॑। भू॒या॒त्। अ॒ग्नये॑। स्वाहा॑। सोमा॑य। स्वाहा॑। स॒वि॒त्रे। स्वाहा॑। सर॑स्वत्यै। स्वाहा॑। पू॒ष्णे। स्वाहा॑। बृह॒स्पत॑ये। स्वाहा॑। इन्द्रा॑य। स्वाहा॑। घोषा॑य। स्वाहा॑। श्लोका॑य। स्वाहा॑। अꣳशा॑य। स्वाहा॑। भगा॑य। स्वाहा॑। अ॒र्य्य॒म्णे स्वाहा॑ ॥५॥

Mantra without Swara
सोमस्य त्विषिरसि तवेव मे त्विषिर्भूयात् अग्नये स्वाहा सोमाय स्वाहा सवित्रे स्वाहा सरस्वत्यै स्वाहा पूष्णे स्वाहा बृहस्पतये स्वाहेन्द्राय स्वाहा घोषाय स्वाहा श्लोकाय स्वाहाँशाय स्वाहा भगाय स्वाहार्यम्णे स्वाहा ॥

सोमस्य। त्विषिः। असि। तवेवेति तवऽइव। मे। त्विषिः। भूयात्। अग्नये। स्वाहा। सोमाय। स्वाहा। सवित्रे। स्वाहा। सरस्वत्यै। स्वाहा। पूष्णे। स्वाहा। बृहस्पतये। स्वाहा। इन्द्राय। स्वाहा। घोषाय। स्वाहा। श्लोकाय। स्वाहा। अꣳशाय। स्वाहा। भगाय। स्वाहा। अर्य्यम्णे स्वाहा॥५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे राजन् ! जैसे आप (सोमस्य) ऐश्वर्य की (त्विषिः) ज्योति (असि) हैं, वैसे मैं क्षत्रिय भी होऊँ, जिससे (तवेव) आपके समान (मे) मेरा भी (त्विषिः) विज्ञान प्रकाश (भूयात्) हो।
जैसे आप (अग्नये) विद्युत् आदि के लिये (स्वाहा) सत्य भाषण तथा प्रियाचरण से युक्त विद्या को, (सोमाय) औषध-विज्ञान के लिये (स्वाहा) वैद्यक और पुरुषार्थ विद्या को, (सवित्रे) सूर्यविज्ञान के लिये (स्वाहा) ज्योतिविद्या को, (सरस्वत्यै) वेदार्थ की सुरक्षा को बतलाने वाली वाणी की प्राप्ति के लिये (स्वाहा) व्याकरण आदि वेदाङ्ग की विद्या को, (पूष्णे) प्राण तथा पशुओं के पालन के लिये (स्वाहा) योग तथा व्यवहार विद्या को, (बृहस्पते) प्रकृति आदि के पति=ईश्वर के विज्ञान के लिये (स्वाहा) ब्रह्मविद्या को, (इन्द्राय) इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीव के बोध के लिये (स्वाहा) विवेकविद्या को (घोषाय) सत्य और प्रिय भाषण आदि युक्त वाणी की प्राप्ति के लिये (स्वाहा) सत्य-उपदेश में वक्तृत्व विद्या को, (श्लोकाय) तत्त्वसंधात, श्रेष्ठ काव्य, गद्य, पद्य, छन्दोरचना आदि के विज्ञान के लिये (स्वाहा) तत्त्वज्ञान तथा काव्यशास्त्र आदि की विद्या को, (अंशाय) परमाणुओं को समझने के लिये (स्वाहा) सूक्ष्म पदार्थ विद्या को, (भगाय) ऐश्वर्य-प्राप्ति के लिये (स्वाहा) पुरुषार्थ विद्या को, और (अर्य्यम्णे) न्यायाधीश बनने के लिये (स्वाहा) राजनीति विद्या को ग्रहण करते हो, वैसे मैं भी ग्रहण करता हूँ ॥ १० ।५ ।।
Essence
मनुष्यों को यह कामना करनी चाहिये कि जैसे आप्त राजाओं के शुभ गुण-कर्म-स्वभाव हैं वैसे ही हमारे हों ।। १० । ५ ।।
Subject
क्षत्रियों को आप्त राजाओं का ही अनुकरण करना चाहिये, दूसरे क्षुद्राशय, लोभी, अन्यायकारी, अजितेन्द्रियों का नहीं, यह उपदेश किया है।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ३ । ५ ।३-९) में की गई है ।। १० । ५ ।।
Commentary Essence
क्षत्रिय आप्त राजाओं का ही अनुकरण करें--आप्त राजा ऐश्वर्य की ज्योति तथा विज्ञान का प्रकाशक होता है। वह विद्युत् आदि विज्ञान की प्राप्ति के लिये सत्यभाषण एवं प्रियाचरण की विद्या को, औषध-विज्ञान के लिये वैद्यक विद्या और पुरुषार्थ विद्या को, सूर्य विज्ञान के लिये ज्योतिष विद्या को, वेदार्थ को जानने के लिये व्याकरण आदि वेदाङ्ग की विद्या को, प्राणों की रक्षा के लिये योग विद्या तथा पशुपालन के लिये व्यवहार विद्या को, ईश्वर के विज्ञान के लिये ब्रह्म विद्या को, जीव के बोध के लिये विवेक विद्या को, सत्य तथा प्रिय भाषण के लिये वक्तृत्व विद्या (भाषणकला) को, तत्त्वसमूह को जानने के लिये तत्त्व ज्ञान तथा श्रेष्ठ काव्य, गद्य, पद्य और छन्दोरचना के लिये काव्यशास्त्र आदि की विद्या को, परमाणुओं को समझने के लिये सूक्ष्म पदार्थ विद्या को, ऐश्वर्य की वृद्धि के लिये पुरुषार्थ विद्या को, न्यायाधीश होने के लिये राजनीति विद्या को ग्रहण करता है ।
क्षत्रियों को उचित है कि वे इन शुभ गुण-कर्म-स्वभाव से युक्त आप्त राजाओं का ही अनुकरण करें, दूसरे क्षुद्राशय, लोभी, अन्यायी, अजितेन्द्रिय (लम्पट) राजाओं का अनुकरण कभी न करें ।। १० । ५ ।।