Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 30

34 Mantra
10/30
Devata- क्षत्रपतिर्देवता Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- स्वराट आर्षी जगती, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒वि॒त्रा प्र॑सवि॒त्रा सर॑स्वत्या वा॒चा त्वष्ट्रा॑ रू॒पैः पू॒ष्णा प॒शुभि॒रिन्द्रे॑णा॒स्मे बृह॒स्पति॑ना॒ ब्रह्म॑णा॒ वरु॑णे॒नौज॑सा॒ऽग्निना॒ तेज॑सा॒ सोमे॑न॒ राज्ञा॒ विष्णु॑ना दश॒म्या दे॒वत॑या॒ प्रसू॑तः प्रस॑र्पामि॥३०॥

स॒वि॒त्रा। प्र॒स॒वि॒त्रेति॑ प्रऽसवि॒त्रा। सर॑स्वत्या। वा॒चा। त्वष्ट्रा॑। रू॒पैः। पू॒ष्णा। प॒शुभि॒रिति॑ प॒शुऽभिः॑। इन्द्रे॑ण। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। बृह॒स्पति॑ना। ब्रह्म॑णा। वरु॑णेन। ओज॑सा। अ॒ग्निना॑। तेज॑सा। सोमे॑न। राज्ञा॑। विष्णु॑ना। द॒श॒म्या। दे॒वत॑या। प्रसू॑त॒ इति॒ प्रऽसू॑तः। प्र। स॒र्पा॒मि॒ ॥३०॥

Mantra without Swara
सवित्रा प्रसवित्रा सरस्वत्या वाचा त्वष्ट्रा रूपैः पूष्णा पशुभिरिन्द्रेणास्मे बृहस्पतिना ब्रह्मणा वरुणेनौजसाग्निना तेजसा सोमेन राज्ञा विष्णुना दशम्या देवतया प्रसूतः प्रसर्पामि ॥

सवित्रा। प्रसवित्रेति प्रऽसवित्रा। सरस्वत्या। वाचा। त्वष्ट्रा। रूपैः। पूष्णा। पशुभिरिति पशुऽभिः। इन्द्रेण। अस्मेऽइत्यस्मे। बृहस्पतिना। ब्रह्मणा। वरुणेन। ओजसा। अग्निना। तेजसा। सोमेन। राज्ञा। विष्णुना। दशम्या। देवतया। प्रसूत इति प्रऽसूतः। प्र। सर्पामि॥३०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे प्रजा और राजपुरुषो ! जैसे मैं ( प्रसवित्रा) सकल चेष्टाओं के उत्पादक शुभकर्मों के (सवित्रा) प्रेरक वायु से, (सरस्वत्या) प्रशंसनीय विज्ञान की क्रिया से युक्त (वाचा) वेदवाणी के समान सत्यभाषण से (त्वष्ट्रा) छेदक, प्रतापी सूर्य के समान न्याय के द्वारा (रूप:) सुखस्वरूप से, (पूष्णा) पृथिवी के द्वारा, (पशुभिः) गौ आदि पशुओं के समान प्रजा के पालन से, (इन्द्रेण) विद्युत् के समान ऐश्वर्यवान् (अस्मे) अपने लोगों से, (ब्रह्मणा) वेदार्थ के ज्ञाता और उपदेशक (बृहस्पतिना) बड़ों के रक्षक, चारों वेदों के वेत्ता विद्वान् के समान विद्या और सुशिक्षा के प्रचार से, (ओजसा) बलवान् (वरुणेन) जल के समान शान्ति से, (तेजसा) तीक्ष्ण ज्योति के समान शत्रुओं के दहकते (अग्निना) अग्नि से, (राज्ञा) प्रकाशमान (सोमेन) चन्द्रमा के समान आह्लादक गुण से, (दशम्या) दसवें (देवतया) देदीप्यमान देवता (विष्णुना) व्यापक परमेश्वर के समान शुभ गुण, कर्म, स्वभाव से (प्रसूतः) प्रेरित होकर (प्रसर्पामि) प्रगति करता हूँ, वैसे तुम लोग भी प्रगति करो ॥ १० । ३० ।।
Essence
जो पुरुष सूर्य आदि के गुणों से युक्त और पिता के समान प्रजा का पालक हो, वह राजा बनने के योग्य होता है, और जो इस प्रकार पुत्र के समान वर्ताव करे वह प्रजा बन सकती है ।। १० । ३० ।।
Subject
राजा वा रानी को कैसे गुणों से युक्त होना चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है।।
Refrences
(पूष्णा) पूषा' शब्द निघं ० ( १ ।१ ) में पृथिवी नामों में पढ़ा है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ४ । ५। २) में की गई है ।। १० । ३० ।।
Commentary Essence
राजा कैसा हो--राजा सकल शुभ कर्मों का उत्पादक तथा प्रेरक वायु के समान शुभ कर्मों में निरत रहने वाला हो। प्रशस्त विज्ञान से युक्त वेदवाणी के समान सत्यभाषण करने वाला हो। अन्धकार के उच्छेदक, प्रतापवान् सूर्य के समान न्यायाचरण से स्वयं सुखी तथा प्रजा के लिये सुखदायक हो। गौ आदि पशुओं के पालन से पृथिवीस्थ प्रजा का पालक हो। विद्युत् के समान ऐश्वर्यवान् होकर अपनी प्रजा को भी ऐश्वर्यवान् करने वाला हो। स्वयं वेदार्थ का ज्ञाता तथा वेदार्थ का उपदेष्टा होकर चारों वेदों के ज्ञाता विद्वान् के समान विद्या और सुशिक्षा के प्रचार से पिता के समान प्रजा का पालक हो । जल के समान शान्ति से बलवान् हो। अग्नि के समान शत्रुओं का दाहक हो। चन्द्रमा की चाँदनी के समान प्रजा के चित्त का आह्लादक हो। सर्वव्यापक परमेश्वर के समान शुभ गुण, कर्म, स्वभाव से देदीप्यमान हो। जो पुरुष इन गुणों से युक्त हो वही राजा बन सकता है। और जो राजा के प्रति पुत्र के समान वर्ताव करे वह प्रजा हो सकती है ।। १० । ३० ।।