Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 3

34 Mantra
10/3
Devata- अपां पतिर्देवता Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- अभिकृतिः,निचृत् जगती, Swara- ऋषभः, निषादः
Mantra with Swara
अ॒र्थेत॑ स्थ राष्ट्र॒दा रा॒ष्ट्रं मे॑ दत्त॒ स्वाहा॒र्थेत॑ स्थ राष्ट्र॒दा रा॒ष्ट्रम॒मुष्मै॑ द॒त्तौज॑स्वती स्थ राष्ट्र॒दा रा॒ष्ट्रं मे॑ दत्त॒ स्वाहौज॑स्वती स्थ राष्ट्र॒दा रा॒ष्ट्रम॒मुष्मै॑ द॒त्तापः॑ परिवा॒हिणी॑ स्थ राष्ट्र॒दा रा॒ष्ट्रं मे॑ दत्त॒ स्वाहापः॑ परिवा॒हिणी॑ स्थ राष्ट्र॒दा रा॒ष्ट्रम॒मुष्मै॑ दत्ता॒पां पति॑रसि राष्ट्र॒दा रा॒ष्ट्रं मे देहि॒ स्वाहा॒ऽपां पति॑रसि राष्ट्र॒दा रा॒ष्ट्रम॒मुष्मै॑ देह्य॒पां गर्भो॑ऽसि राष्ट्र॒दा रा॒ष्ट्रं मे॑ देहि॒ स्वाहा॒ऽपां गर्भो॑ऽसि राष्ट्र्र॒दा रा॒ष्ट्रम॒मुष्मै॑ देहि॥३॥

अ॒र्थेत॒ इत्य॑र्थ॒ऽइ॑तः। स्थ॒। रा॒ष्ट्र॒दा इति राष्ट्र॒ऽदाः। रा॒ष्ट्रम्। मे॒। द॒त्त॒। स्वाहा॑। अ॒र्थेत॒ इत्य॑र्थ॒ऽइतः॑। स्थ॒। रा॒ष्ट्र॒दा इति॑ राष्ट्र॒ऽदाः। रा॒ष्ट्रम्। अ॒मुष्मै॑। द॒त्त॒। ओज॑स्वतीः। स्थ॒। रा॒ष्ट्र॒दा इति॑ राष्ट्र॒ऽदाः। रा॒ष्ट्रम्। मे॒। द॒त्त॒। स्वाहा॑। ओज॑स्वतीः। स्थ॒। रा॒ष्ट्र॒दा इति॑ राष्ट्र॒ऽदाः। रा॒ष्ट्रम्। अ॒मु॒ष्मै॑। द॒त्त॒। आपः॑। प॒रिवा॒हिणीः॑। प॒रि॒वा॒हिनी॒रिति॑ परिऽवा॒हिनीः॑। स्थ॒। रा॒ष्ट्र॒दा इति॑ राष्ट्र॒ऽदाः। रा॒ष्ट्रम्। मे॒। द॒त्त॒। स्वाहा॑। आपः॑। प॒रिवा॒हिणीः॑। प॒रि॒वा॒हिनी॒रिति॑ परिऽवा॒हिनीः॑। स्थ॒। रा॒ष्ट्र॒दा इति॑ राष्ट्र॒ऽदाः। रा॒ष्ट्रम्। अ॒मुष्मै॑। द॒त्त॒। अ॒पाम्। पतिः॑। अ॒सि॒। रा॒ष्ट्र॒दा इति॑ राष्ट्र॒ऽदाः। रा॒ष्ट्रम्। मे॒। दे॒हि॒। स्वाहा॑। अ॒पाम्। पतिः॑। अ॒सि॒। रा॒ष्ट्र॒दा इति॑ राष्ट्र॒ऽदाः। रा॒ष्ट्रम्। अ॒मुष्मै॑। दे॒हि॒। अ॒पाम्। गर्भः॑। अ॒सि॒। रा॒ष्ट्र॒दा इति॑ राष्ट्र॒ऽदाः। रा॒ष्ट्रम्। मे॒। दे॒हि॒। स्वाहा॑। अ॒पाम्। गर्भः॑। अ॒सि॒। रा॒ष्ट्र॒दा इति॑ राष्ट्र॒ऽदाः। रा॒ष्ट्रम्। अ॒मुष्मै॑। दे॒हि॒ ॥३॥

Mantra without Swara
अर्थेत स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त देह्यर्थेत स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्तौजस्वती स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रम्मे दत्त स्वाहौजस्वती स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्तापः परिवाहिणी स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रम्मे दत्त स्वाहापः परिवाहिणी स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै दत्तापम्पतिरसि राष्ट्रदा राष्ट्रम्मे देहि स्वाहापाम्पतिरसि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देह्यपाङ्गर्भासि राष्ट्रदा राष्ट्रम्मे देहि स्वाहापाङ्गर्भासि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देहि सूर्यत्वचस स्थ ॥

अर्थेत इत्यर्थऽइतः। स्थ। राष्ट्रदा इति राष्ट्रऽदाः। राष्ट्रम्। मे। दत्त। स्वाहा। अर्थेत इत्यर्थऽइतः। स्थ। राष्ट्रदा इति राष्ट्रऽदाः। राष्ट्रम्। अमुष्मै। दत्त। ओजस्वतीः। स्थ। राष्ट्रदा इति राष्ट्रऽदाः। राष्ट्रम्। मे। दत्त। स्वाहा। ओजस्वतीः। स्थ। राष्ट्रदा इति राष्ट्रऽदाः। राष्ट्रम्। अमुष्मै। दत्त। आपः। परिवाहिणीः। परिवाहिनीरिति परिऽवाहिनीः। स्थ। राष्ट्रदा इति राष्ट्रऽदाः। राष्ट्रम्। मे। दत्त। स्वाहा। आपः। परिवाहिणीः। परिवाहिनीरिति परिऽवाहिनीः। स्थ। राष्ट्रदा इति राष्ट्रऽदाः। राष्ट्रम्। अमुष्मै। दत्त। अपाम्। पतिः। असि। राष्ट्रदा इति राष्ट्रऽदाः। राष्ट्रम्। मे। देहि। स्वाहा। अपाम्। पतिः। असि। राष्ट्रदा इति राष्ट्रऽदाः। राष्ट्रम्। अमुष्मै। देहि। अपाम्। गर्भः। असि। राष्ट्रदा इति राष्ट्रऽदाः। राष्ट्रम्। मे। देहि। स्वाहा। अपाम्। गर्भः। असि। राष्ट्रदा इति राष्ट्रऽदाः। राष्ट्रम्। अमुष्मै। देहि॥३॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे राजा लोगो ! जो तुम (अर्थेतः) अर्थ को प्राप्त करने वाले होकर (स्वाहा) सत्य वाणी से (राष्ट्रदाः) राज्य प्रदान करने वाले सभासद (स्थ) हो, सो आप (मे) मुझे (राष्ट्रम्) राज्य (दत्त) प्रदान करो। और--
जो तुम (अर्थेतः) अर्थ को प्राप्त करने वाले होकर (राष्ट्रदाः) राज्य प्रदान करने वाले सभासद (स्थ) हो, सो आप (अमुष्मै) उसे (राष्ट्रम्) राज्य (दत्त) प्रदान करो ।
हे राजा की स्त्रियो ! जो तुम (स्वाहा) न्याययुक्त नीति से (ओजस्वती) विद्या, बल और पराक्रम से युक्त होकर (राष्ट्रदाः) राज्य प्रदान करने वाली सभासद (स्थ) हो, सो आप (मे) मुझे (राष्ट्रम्) राज्य (दत्त) प्रदान करो। और--
जो तुम (ओजस्वतीः) जितेन्द्रिय (राष्ट्रदाः) राज्य प्रदान करने वाली सभासद (स्थ) हो, सो आप (अमुष्मै) उसे (राष्ट्रम्) राज्य ( दत्त) प्रदान करो ।
जो तुम (स्वाहा) प्रिय वाणी से ( परिवाहिणीः) अपने सदृश पतियों को प्राप्त करने वाली (आपः) जल और प्राण के समान प्रिय तथा (राष्ट्रदाः) राज्य प्रदान करने वाली सभासद (स्थ) हो, सो आप (मे) मुझे (राष्ट्रम्) राज्य (दत्त) प्रदान करो ।
जो तुम (परिवाहिणी:) अपने सदृश पतियों को प्राप्त करने वाली (आपः) जल और प्राण के समान प्रिय तथा (राष्ट्रदाः) राज्य प्रदान करने वाली सभासद (स्थ) हो, सो आप (अमुष्मै) उसे (राष्ट्रम्) राज्य (दत्त) प्रदान करो।
हे राजन् ! जो आप (राष्ट्रदाः) राज्य प्रदान करने वाले सभासद होकर (अपाम्) पूर्वोक्त जल के (पतिः) पालक (असि) हो, सो आप (मे) मुझे (राष्ट्रम्) राज्य (देहि) दीजिये। और--
जो आप (स्वाहा) सत्यवाणी से (राष्ट्रदाः) राज्य प्रदान करने वाले सभासद होकर (अपाम्) पूर्वोक्त जल के (पतिः) पालक (असि) हो, सो आप (अमुष्मै) उसे (राष्ट्रम्) राज्य (देहि) दीजिए। और--
जो आप (स्वाहा) युक्तियुक्त वाणी से (राष्ट्रदाः) राज्य प्रदान करने वाले सभासद होकर (अपाम्) प्राणों की (गर्भः) गर्भ के समान रक्षा करने वाले (असि) हो, सो आप (मे) मुझे (राष्ट्रम्) राज्य (देहि) दीजिए। और--
जो आप (राष्ट्रदाः) राज्य प्रदान करने वाले सभासद होकर (अपाम्) जल की (गर्भः) स्तुति करने वाले (असि) हो, सो आप (अमुष्मै) उसे (राष्ट्रम्) राज्य (देहि ) दीजिये ।। १० । ३ ।।
Essence
जो राजा लोग और राजाओं की स्त्रियाँ होवें वे अपनी उन्नति के लिये दूसरों की उन्नति को सहन करें तथा सब मनुष्यों को विद्या और सुशिक्षा से युक्त करके राज्य के सेवक और राज्य की सेविका बनें। ईर्ष्या से दूसरों की हानि करके अपने राज्य के पतन को आमन्त्रित न करें ।। १०।३।।
Subject
राजा, मन्त्री, सेना और प्रजा के पुरुष परस्पर कैसे वर्ताव करें, इस विषय का उपदेश किया है ।।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ३ । ४ । ७-११) में की गई है ।। १० ।३ ।।
Commentary Essence
राजा और प्रजा का परस्पर बर्ताव—राजा तत्त्व को समझने वाले लोगों से; विद्या, बल और पराक्रम से युक्त राज स्त्रियों से, जितेन्द्रिय लोगों से, अपने सदृश पतियों से विवाह करने वाली, जल और प्राणों के समान प्रिय स्त्रियों से, जो उसे राज्य प्रदान करने वाले उसके सभासद हैं उनसे राज्यप्राप्ति की कामना करे। यदि राजा अपनी उन्नति चाहे तो इन विद्वान् सभासदों की रक्षा किया करे। दूसरों की उन्नति को सहन करे। सब मनुष्यों को विद्या और सुशिक्षा से युक्त करके राज्य की सेवा करे। ईर्ष्या से प्रजा हानि करके राज्य के पतन को कभी आमन्त्रित न करे। राजपत्नी भी प्रजा के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करे। इस प्रकार राजा, मन्त्री, सेना और प्रजाजन सब मिलकर राष्ट्र को उन्नत करें ॥ १० । ३॥