Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 29

34 Mantra
10/29
Devata- सवित्रादिमन्त्रोक्ता देवताः Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- भूरिक ब्राह्मी त्रिष्टुप्, Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒ग्निः पृ॒थुर्धर्म॑ण॒स्पति॑र्जुषा॒णोऽअ॒ग्निः पृ॒थुर्धर्म॑ण॒स्पति॒राज्य॑स्य वेतु॒ स्वाहा॒। स्वाहा॑कृताः॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॑र्यतध्वꣳ सजा॒तानां॑ मध्य॒मेष्ठ्या॑य॥२९॥

अ॒ग्निः। पृ॒थुः। धर्म॑णः। पतिः॑। जु॒षा॒णः। अ॒ग्निः। पृ॒थुः। धर्म॑णः। पतिः॑। आज्य॑स्य। वे॒तु॒। स्वाहा॑। स्वाहा॑कृता॒ इति॒ स्वाहा॑ऽकृताः। सूर्य॑स्य। र॒श्मिभि॒रिति॑ र॒श्मिऽभिः॑। य॒त॒ध्व॒म्। स॒जा॒ताना॒मिति॑ सऽजा॒ताना॑म्। म॒ध्य॒मेष्ठ्या॑य। म॒ध्यमेस्थ्या॒येति॑ मध्य॒मेऽस्थ्या॑य ॥२९॥

Mantra without Swara
अग्निः पृथुर्धर्मणस्पतिर्जुषाणोऽअग्निः पृथुर्धर्मणस्पतिराज्यस्य वेतु स्वाहा । स्वाहाकृताः सूर्यस्य रश्मिबिर्यतध्वँ सजातानाॐम्मध्यमेष्ठ्याय ॥

अग्निः। पृथुः। धर्मणः। पतिः। जुषाणः। अग्निः। पृथुः। धर्मणः। पतिः। आज्यस्य। वेतु। स्वाहा। स्वाहाकृता इति स्वाहाऽकृताः। सूर्यस्य। रश्मिभिरिति रश्मिऽभिः। यतध्वम्। सजातानामिति सऽजातानाम्। मध्यमेष्ठ्याय। मध्यमेस्थ्यायेति मध्यमेऽस्थ्याय॥२९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे राजन् ! वा रानी ! जैसे (पृथुः) विस्तृत पुरुषार्थ वाला (धर्मणः) अपने धर्म का (पतिः) पालक (जुषाण:) सेवन करने योग्य (अग्निः) भौतिक अग्नि (सजातानाम्) प्राणियों के (मध्यमेष्ठ्याय) पक्षपात रहित न्याय के दृष्टान्तभाव के लिये (स्वाहा) सत्य क्रिया से (आज्यस्य) घृतादि की हवियों को प्राप्त करता है तथा सूर्य की किरणों के साथ हवि को प्रसारित करके सुख पहुँचाता है, वैसे (धर्मणः) न्याय के (पतिः) रक्षक, (पृथुः) महान् (जुषाण:) सेवक (अग्निः) विद्युत् के समान आप राष्ट्र को (वेतु) प्राप्त कीजिये।
हे (स्वाहाकृताः) सत्याचरण करने वाली सभासद् स्त्रियो! तुम भी [यतध्वम्] ऐसा ही प्रयत्न करो ।। १० । २९ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। हे राजपुरुषो और प्रजाजनो ! तुम लोग--जैसे सूर्य, प्रसिद्ध अग्नि और विद्युत् के समान वर्ताव करके, पक्षपात को छोड़कर, समान आयु वालों में मध्यस्थ होकर न्याय करते हो, वैसे यह अग्नि सूर्य के प्रकाश में और वायु में सुगन्धित द्रव्य को पहुँचाकर वायु, जल और औषधियों की शुद्धि से सब प्राणियों को सुख देती है, वैसे न्याययुक्त कर्मों के अनुष्ठान से सब प्रजा को सुखी करो ।। १० । २९ ।।
Subject
फिर राजा और प्रजा के जन किसके समान क्या करें, यह उपदेश किया है ।।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ४ । ४ । २२-२३) में की गई है ।। १० । २९ ।।
Commentary Essence
राजा और प्रजा क्या करे--अग्नि मनुष्य के लिये पुरुषार्थ का विस्तारक है, अपने प्रकाश आदि धर्मों का पालक है, सेवन करने के योग्य है, अन्य भूतों के साथ पक्षपात रहित भाव से रहता है, अपनी सत्य चेष्टा से घृत आदि की छवि को प्राप्त करता है और उसे सूर्य की किरणों के द्वारा सर्वत्र फैलाकर प्राणियों को सुख देता है। राजा और प्रजाजन सूर्य, प्रसिद्ध स्थूल अग्नि और विद्युत् के समान परस्पर व्यवहार करें। अर्थात् न्याय आदि अपने धर्मों के पालक बनें, पुरुषार्थ का विस्तार करने वाले होकर महान् बनें, परस्पर सेवक बनें, अपने समान आयु वालों में मध्यस्थ होकर पक्षपात छोड़कर न्याय करें। जैसे अग्नि सूर्य के प्रकाश में और वायु में सुगन्धित द्रव्य को फैलाकर वायु, जल और औषधियों की शुद्धि से सब प्राणियों को सुख पहुँचाता है, वैसे न्याययुक्त कर्मों का आचरण करके राजा लोग सब प्रजा को सुखी करें। सत्याचरण करने वाली सभासद स्त्रियाँ भी ऐसा ही प्रयत्न किया करें ।। १० । २९।।