Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 28

34 Mantra
10/28
Devata- अग्निर्देवता Rishi- शुनःशेप ऋषिः Chhand- विराट् धृति, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ॒भि॒भूर॑स्ये॒तास्ते॒ पञ्च॒ दिशः॑ कल्पन्तां॒ ब्रह्मँ॒स्त्वं ब्र॒ह्मासि॑ सवि॒तासि॑ स॒त्यप्र॑सवो॒ वरु॑णो॑ऽसि स॒त्यौजा॒ऽइन्द्रो॑ऽसि॒ विशौ॑जा रु॒द्रोऽसि सु॒शेवः॑। बहु॑कार॒ श्रेय॑स्कर॒ भूय॑स्क॒रेन्द्र॑स्य॒ वज्रो॑ऽसि॒ तेन॑ मे रध्य॥२८॥

अ॒भि॒भुरित्य॑भि॒ऽभूः। अ॒सि॒। ए॒ताः। ते। पञ्च॒। दि॒शः॑। क॒ल्प॒न्ता॒म्। ब्रह्म॑न्। त्वम्। ब्र॒ह्मा। अ॒सि॒। स॒वि॒ता। अ॒सि॒। स॒त्य॑प्रसव॒ इति॑ स॒त्यऽप्र॑सवः। वरु॑णः। अ॒सि॒। स॒त्यौजा॒ इति॑ स॒त्यऽओ॑जाः। इन्द्रः॑। अ॒सि॒। विशौ॑जाः। रु॒द्रः। अ॒सि॒। सु॒शेव॒ इति॑ सु॒ऽशेवः॑। बहु॑का॒रेति॒ बहु॑ऽकार। श्रेय॑स्कर। श्रेयः॑क॒रेति॒ श्रेयः॑ऽकर। भूय॑स्कर। भूयः॑क॒रेति॒ भूयः॑ऽकर। इन्द्र॑स्य। वज्रः॑। अ॒सि॒। तेन॑। मे॒। र॒ध्य॒ ॥२८॥

Mantra without Swara
अभिभूरस्येतास्ते पञ्च दिशः कल्पन्ताम्ब्रह्मँस्त्वम्ब्रह्मासि सवितासि सत्यप्रसवो वरुणोसि सत्यौजाःऽइन्द्रोसि विशौजाः रुद्रोसि सुशेवः । बहुकार श्रेयस्कर भूयस्करेन्द्रस्य वज्रोसि तेन मे रध्य ॥

अभिभूरित्यभिऽभूः। असि। एताः। ते। पञ्च। दिशः। कल्पन्ताम्। ब्रह्मन्। त्वम्। ब्रह्मा। असि। सविता। असि। सत्यप्रसव इति सत्यऽप्रसवः। वरुणः। असि। सत्यौजा इति सत्यऽओजाः। इन्द्रः। असि। विशौजाः। रुद्रः। असि। सुशेव इति सुऽशेवः। बहुकारेति बहुऽकार। श्रेयस्कर। श्रेयःकरेति श्रेयःऽकर। भूयस्कर। भूयःकरेति भूयःऽकर। इन्द्रस्य। वज्रः। असि। तेन। मे। रध्य॥२८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (बहुकार) नाना सुखों को उत्पन्न करने वाले, (श्रेयस्कर) कल्याणकारी, (भूयस्कर) बार-बार शुभ कर्मों का अनुष्ठान करने वाले (ब्रह्मन्) ब्रह्म विद्या को प्राप्त राजन्! जैसे (ते) आपके लिये ये (पञ्च) पूर्व आदि चार तथा नीचे-ऊपर की एक=पांच दिशायें सुखयुक्त हों वैसे मुझे, आपकी पत्नी के लिये भी (कल्पताम्) सुख युक्त हों।
जैसे आप (अभिभूः) दुष्टों का तिरस्कार करने वाले (ब्रह्मा) चारों वेदों तथा सब राजा-प्रजा के सुखों के हेतु पदार्थों के निर्माता (असि) हो, (सविता) ऐश्वर्य के उत्पादक (असि) हो, (सत्यप्रसवः) सत्य कर्म से ऐश्वर्य को उत्पन्न करने वाले (वरुण:) श्रेष्ठ स्वभाव वाले (असि) हो, (सत्यौजाः) सत्य बल वाले (इन्द्रः) सुखों को धारण करने वाले (असि) हो, (विशौजा) प्रजा के सहाय से पराक्रमी, (सुशेव:) उत्तम सुख वाले (रुद्रः) दुष्टों को रुलाने वाले (असि) हो, (इन्द्रस्य) ऐश्वर्य को (वज्रः) प्राप्त कराने वाले (असि) हो, मैं आपकी पत्नी भी वैसी बनूँ ।
जैसे मैं जिस हेतु से आपके लिये ऋद्धि-ऐश्वर्य की सिद्धि करूँ वैसे आप उसी हेतु से (मे) मेरे लिये (रध्य) ऐश्वर्य को सिद्ध कीजिये ।। १० । २८ ।।
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। जैसे पुरुष दिग्विजयी, कीर्तिमान्, वेद में प्रवीण, सत्याचरण करने वाला, सबको सुख देने वाला धार्मिक हो वैसी उसकी पत्नी भी होवे ।
सब लोग राजधर्म को स्वीकार करके नाना सुख और नाना ऐश्वर्य को प्राप्त करें ।।१०।२८ ।।
Subject
फिर वह राजा कैसा हो के किसके लिये क्या करे, इस विषय का उपदेश किया है ।।
Refrences
(सुशेव:) 'शेव' शब्द निघं० (३ । ६) में सुख-नामों में पढ़ा है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ४ । ४ । ६-२१) में की गई है ।। १० । २८ ।।
Commentary Essence
१. राजा कैसा हो--राजा बहुत सुखों का उत्पादक, कल्याणकारी, शुभ कर्मों का बार-बार अनुष्ठान करने वाला, ब्रह्मविद्या को जानने वाला, सब दिशाओं को विजय करने वाला, कीर्तिमान्, दुष्टों का तिरस्कार करने वाला, चारों वेदों का ज्ञाता तथा सब सुखदायक पदार्थों का निर्माता, सत्याचरण से ऐश्वर्य का उत्पादक, श्रेष्ठ स्वभाव वाला, सत्य बल वाला, सुखों को धारण करने वाला, प्रजा के सहयोग से पराक्रमयुक्त, सबको उत्तम सुख देने वाला, दुष्ट शत्रुओं को रुलाने वाला और ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाला धार्मिक पुरुष हो। उसकी पत्नी भी ऐसी ही हो ।
स्त्री-पुरुष राजधर्म को स्वीकार करके नाना सुख और नाना ऐश्वर्य को प्राप्त करें ।
२. अलङ्कार–इस मन्त्र में उपमावाचक 'इव' आदि शब्द लुप्त है, अतः वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि राजा के समान राजपत्नी भी कीर्ति आदि गुणों से भूषित हो।। १० । २८ ।।