Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 25

34 Mantra
10/25
Devata- आसन्दी राजपह्णी देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- आर्षी जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
इय॑द॒स्यायु॑र॒स्यायु॒र्मयि॑ धेहि॒ युङ्ङ॑सि॒ वर्चो॑ऽसि॒ वर्चो॒ मयि॑ धे॒ह्यूर्ग॒स्यूर्जं॒ मयि॑ धेहि। इन्द्र॑स्य वां वीर्य॒कृतो॑ बा॒हूऽअ॑भ्यु॒पाव॑हरामि॥२५॥

इय॑त्। अ॒सि॒। आयुः॑। अ॒सि॒। आयुः॑। मयि॑। धे॒हि॒। युङ्। अ॒सि॒। वर्चः॑। अ॒सि॒। वर्चः॑। मयि॑। धे॒हि॒। ऊर्क्। अ॒सि॒। ऊर्ज॑म्। मयि॑। धे॒हि॒। इन्द्र॑स्य। वा॑म्। वी॒र्य॒कृत॒ इति वीर्य॒ऽकृतः॑। बा॒हू इति॑ बा॒हू। अ॒भ्यु॒पाव॑हरा॒मीत्य॑भिऽ उ॒पाव॑हरामि ॥२५॥

Mantra without Swara
इयदस्यायुरस्यायुर्मयि धेहि युङ्ङसि वर्चासि वर्चा मयि धेह्यूर्गस्यूर्जम्मयि धेहि । इन्द्रस्य वाँवीर्यकृतो बाहूअभ्युपावहरामि ॥

इयत्। असि। आयुः। असि। आयुः। मयि। धेहि। युङ्। असि। वर्चः। असि। वर्चः। मयि। धेहि। ऊर्क्। असि। ऊर्जम्। मयि। धेहि। इन्द्रस्य। वाम्। वीर्यकृत इति वीर्यऽकृतः। बाहू इति बाहू। अभ्युपावहरामीत्यभिऽ उपावहरामि॥२५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे ब्रह्मन् ! आप (आयुः) मेरा जीवन (असि) हो, (इयत्) परिमित (आयुः) जीवन (मयि) मुझ जीवात्मा में (धेहि) स्थापित कीजिये । आप (युङ्) समाधि प्रदान करने वाले (असि) हो, (वर्च:) स्वप्रकाशस्वरूप (असि) हो, सो योग से उत्पन्न (वर्च:) प्रकाश को (मयि) मुझ जीवात्मा में (धेहि) स्थापित कीजिये। आप (ऊर्क्) बलवान् (असि) हो, (ऊर्जम्) बल को (मयि) मुझ जीवात्मा में (धेहि) स्थापित कीजिये ।
हे राजपुरुष और प्रजा-जनो! (वीर्यकृतः) बल को उत्पन्न करने वाले (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवान् ईश्वर के आश्रय से (वाम्) तुम्हारे (बाहू) बल और वीर्य को मैं (अभ्युपावहरामि) सब ओर से तुम्हारे समीप स्थापित करता हूँ ।। १० । २५ ।।
Essence
जो लोग आत्मा में स्थित ब्रह्मा की उपासना करते हैं वे उत्तम जीवन आदि को प्राप्त करते हैं। ईश्वर के आश्रय के बिना कोई पूर्ण बल और पराक्रम को नहीं प्राप्त कर सकता ।। १० । २५ ।।
Subject
मनुष्य ईश्वर की उपासना क्यों करे, यह उपदेश किया है ।।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ४ । ३ । २५-२७) में की गई है ।। १० । २५ ।।
Commentary Essence
ब्रह्म की उपासना क्यों करें--ब्रह्म जीवात्मा का जीवन है, जीवात्मा को परिमित आयु प्रदान करता है, ब्रह्म सदा समाहित है, स्वप्रकाशस्वरूप है। ब्रह्म जीवात्मा को योगज प्रकाश प्रदान करता है। ब्रह्म बलवान् है वह आत्मा को बल प्रदान करता है। परम ऐश्वर्यवान् ईश्वर जीव के बल वीर्य को बढ़ाता है। अतः ब्रह्म जीव के लिये उपासना के योग्य है। आत्मा में स्थित ब्रह्म की जो उपासना करते हैं, वे उत्तम आयु, आत्मप्रकाश, बल और वीर्य को प्राप्त करते हैं । ईश्वर के आश्रय के बिना कोई पूर्ण बल और पराक्रम को प्राप्त नहीं कर सकता ।। १० । २५ ।।