Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 24

34 Mantra
10/24
Devata- सूर्यो देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- भूरिक आर्षी जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
ह॒ꣳसः शु॑चि॒षद् वसु॑रन्तरिक्ष॒सद्धोता॑ वेदि॒षदति॑थिर्दुरोण॒सत्। नृ॒षद्व॑र॒सदृ॑त॒सद् व्यो॑म॒सद॒ब्जा गो॒जाऽऋ॑त॒जाऽअ॑द्रि॒जाऽऋ॒तं बृ॒हत्॥२४॥

ह॒ꣳसः। शु॒चि॒षत्। शु॒चि॒सदिति॑ शु॒चि॒ऽसत्। वसुः॑। अ॒न्त॒रि॒क्ष॒सदित्य॑न्तरिक्ष॒ऽसत्। होता॑। वे॒दि॒षत्। वे॒दि॒सदिति॑ वे॒दि॒ऽसत्। अति॑थिः। दु॒रो॒ण॒सदिति॑ दुरोण॒ऽसत्। नृ॒षत्। नृ॒सदिति॑ नृ॒ऽसत्। व॒र॒सदिति॑ वर॒ऽसत्। ऋ॒त॒सदित्यृ॑त॒ऽसत्। व्यो॒म॒सदिति॑ व्योम॒ऽसत्। अ॒ब्जा इत्य॒प्ऽजाः। गो॒जा इति॑ गो॒ऽजाः। ऋ॒त॒जा इत्यृ॑त॒ऽजाः। अ॒द्रि॒जा इत्य॑द्रि॒ऽजाः। ऋ॒तम्। बृ॒हत् ॥२४॥

Mantra without Swara
हँसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजाऽऋतजाऽअद्रिजा ऋतम्बृहत् ॥

हꣳसः। शुचिषत्। शुचिसदिति शुचिऽसत्। वसुः। अन्तरिक्षसदित्यन्तरिक्षऽसत्। होता। वेदिषत्। वेदिसदिति वेदिऽसत्। अतिथिः। दुरोणसदिति दुरोणऽसत्। नृषत्। नृसदिति नृऽसत्। वरसदिति वरऽसत्। ऋतसदित्यृतऽसत्। व्योमसदिति व्योमऽसत्। अब्जा इत्यप्ऽजाः। गोजा इति गोऽजाः। ऋतजा इत्यृतऽजाः। अद्रिजा इत्यद्रिऽजाः। ऋतम्। बृहत्॥२४॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! आप लोग जो परमेश्वर (हंसः) सब पदार्थों को संघात रूप में बनाने वाला, (शुचिषत्) पवित्र पदार्थों में विद्यमान (वसुः) सब में बसने तथा सबको बसाने वाला, (अन्तरिक्षसत्) अन्तरिक्ष=अवकाश में विद्यमान, (होता) सब पदार्थों का दाता, ग्रहण वा प्रलय करने वाला, (वेदिषत्) पृथिवी में विद्यमान, (अतिथिः) अतिथि के समान मान के योग्य, (दुरोणसत्) घर में विद्यमान, (नृषत्) मनुष्यों में विद्यमान, (वरसत्) उत्तम पदार्थों में विद्यमान, (ऋतसत्) ऋत=प्रकृति आदि सत्य पदार्थों में विद्यमान, (व्योमसद्) आकाश में विद्यमान, (अब्जाः) जलों का उत्पादक, (गोजाः) पृथिवी आदि का जनक (ॠतजाः) सत्यविद्या से पूर्ण वेद का प्रकाशक, (अद्रिजाः) मेघ, पर्वत और वृक्ष आदि का उत्पादक (ऋतम्) सत्यस्वरूप (बृहत्) महान् ब्रह्म है; उसी की उपासना करो ॥ १० । २४ ।।
Essence
मनुष्य सर्वव्यापक पवित्रकर्ता ब्रह्म की ही उपासना करें, क्योंकि उसकी उपासना के बिना किसी को भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से उत्पन्न पूर्ण सुख प्राप्त नहीं हो सकता ।। १० ।२४ ।।
Subject
मनुष्य ईश्वर की उपासनापूर्वक सबके लिये न्याय और अच्छी शिक्षा करें, यह उपदेश किया है।।
Refrences
(दुरोणसद्) 'दुरोण' शब्द निघं० (३।४) में गृह-नामों में पढ़ा है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ४ । ३ । २२) में की गई है ।। १० । २४ ।।
Commentary Essence
१. ब्रह्म का स्वरूप--सत्य स्वरूप ब्रह्म सब पदार्थों को संघात रूप देने वाला, सबको पवित्र करने वाला एवं पवित्र पदार्थों में विद्यमान है। सब पदार्थों में बसने वाला और सबको बसाने वाला है। अन्तरिक्ष में विद्यमान है। सृष्टिकाल में सब पदार्थों का दाता और प्रलय समय में सब पदार्थों को ग्रहण करने वाला अथवा सब का भक्षण करने वाला है। पृथिवी में विद्यमान हैं। जिसकी तिथि नियत नहीं उस अतिथि=अभ्यागत के समान मान के योग्य है। सब नरों में विद्यमान है। सब श्रेष्ठ पदार्थों में विद्यमान है। प्रकृति आदि सब सत्य पदार्थों में विद्यमान है। आकाश में विद्यमान है। जल, पृथिवी आदि तथा सत्य विद्यामय वेद को उत्पन्न करने वाला वही हैं। मेघ, पर्वत और वृक्ष आदि को भी वही उत्पन्न करता है। अर्थात् ब्रह्म सर्वव्यापक और सृष्टिकर्ता है।
२. ब्रह्म की उपासना--सर्वव्यापक परब्रहा की सब मनुष्य उपासना करके न्याय और सुशिक्षा का प्रसार करें। ब्रह्म की उपासना के बिना कोई भी मनुष्य पूर्ण सुख को प्राप्त नहीं कर सकता ।।१० । २४ ।।