Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 22

34 Mantra
10/22
Devata- अग्न्यादयो मन्त्रोक्ता देवताः Rishi- देवावात ऋषिः Chhand- विराट् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मा त॑ऽइन्द्र ते व॒यं तु॑राषा॒डयु॑क्तासोऽअब्र॒ह्मता॒ विद॑साम। तिष्ठा॒ रथ॒मधि॒ यं व॑ज्रह॒स्ता र॒श्मीन् दे॑व यमसे॒ स्वश्वा॑न्॥२२॥

मा। ते॒। इ॒न्द्र॒। ते। व॒यम्। तु॒रा॒षा॒ट्। अयु॑क्तासः। अ॒ब्र॒ह्मता॑। वि। द॒सा॒म॒। तिष्ठ॑। रथ॑म्। अधि॑। यम्। व॒ज्र॒ह॒स्ते॒ति॑ वज्रऽहस्त। आ। र॒श्मीन्। दे॒व॒। य॒म॒से॒। स्वश्वा॒निति॑ सु॒ऽअश्वा॑न् ॥२२॥

Mantra without Swara
मा तऽ इन्द्र ते वयन्तुराषाडयुक्तासोऽअब्रह्मता विदसाम । तिष्ठा रथमधि यँवज्रहस्ता रश्मीन्देव यमसे स्वश्वान् ॥

मा। ते। इन्द्र। ते। वयम्। तुराषाट्। अयुक्तासः। अब्रह्मता। वि। दसाम। तिष्ठ। रथम्। अधि। यम्। वज्रहस्तेति वज्रऽहस्त। आ। रश्मीन्। देव। यमसे। स्वश्वानिति सुऽअश्वान्॥२२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (देव) दिव्य गुणों से युक्त (इन्द्र) सभापति (वज्रहस्त) हाथों में वज्र के समान शस्त्रों वाले राजन् (वयम्) हम राजपुरुष और प्रजाजन (ते) आपके सम्बन्ध में (अयुक्तासः) अधर्म करने वाले (मा) न हों, और (ते) आपकी (अब्रह्मता) वेद और ईश्वर सम्बन्धी श्रद्धा कम (मा) न हो जिससे हम लोग आपकी (विदसाम) उपेक्षा करें।
आप (तुराषाट्) शीघ्रकारी शत्रुओं को नष्ट करने वाले हो, सो जिन (रश्मीन्) लगाम वाले (स्वश्वान्) उत्तम घोड़ों को ([आ] यमसे) वश में करते हो और (यम्) जिस (रथम्) रथ में (अधितिष्ठ) बैठते हो, हम लोग भी उन घोड़ों को वश में करें तथा रथ में बैठें ।। १० । २२ ।।
Essence
राजपुरुष और प्रजाजन राजा के साथ अयोग्य व्यवहार कभी न करें, और राजा इनके साथ अन्याय न करे ।
वेद रूप ईश्वर की आज्ञा का अनुष्ठान करके सब तुल्य यान और आसन व्यवहार वाले हों।
आलस्य-प्रमाद, वेद और ईश्वर की निन्दा रूप नास्तिकपन में कभी न रहें ।। १० । २२ ।।
Subject
प्रजापुरुषों को राजा के साथ कैसे बर्ताव करना चाहिये, यह उपदेश किया है।।
Refrences
(तिष्ठा) तिष्ठ। यहाँ 'द्व्यचोऽस्ति' (अ० ६ । ३ । १३५) इस सूत्र से दीर्घ है। इस मन्त्र की व्याख्या शत (५ । ४ । ३ । १४) में की गई है ।। १० । २२ ।।
Commentary Essence
प्रजा का राजा के प्रति वर्ताव--सभापति राजा दिव्य गुणों से युक्त है, उसके हाथों में वज्र के समान शस्त्र हैं। इसलिये राजपुरुष और प्रजाजन राजा के साथ अधर्म=अयोग्य व्यवहार कभी न करें। और राजा का भी कर्त्तव्य है कि वह इनके साथ अन्याय न करे। राजा वेद और ईश्वर के प्रति श्रद्धा से रहित न हो, जिससे प्रजाजन उसकी उपेक्षा करें अथवा वे भी वेद और ईश्वर के प्रति निष्ठाशून्य हो जावें, अपितु सब वेद और ईश्वर में निष्ठावान् हों। आलस्य और प्रमाद में न पड़े रहें । वेद और ईश्वर के निन्दक होकर नास्तिक न बनें ।
राजा शीघ्रकारी शत्रुओं का मर्षण करने वाला हो। वह अपने लगाम वाले उत्तम घोड़ों को वश में रखे। रथ में बैठे। राजपुरुष और प्रजाजन भी अपने घोड़ों को वश में रखें तथा रथ में बैठें। अभिप्राय यह है कि यान और आसन-सम्बन्धी व्यवहारों में सब समान रहें। भेदभाव न रखें ।। १० । २२ ।।