Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 21

34 Mantra
10/21
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- देवावात ऋषिः Chhand- भूरिक ब्राह्मी बृहती, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इन्द्र॑स्य॒ वज्रो॑ऽसि मि॒त्रावरु॑णयोस्त्वा प्रशा॒स्त्रोः प्र॒शिषा॑ युनज्मि। अव्य॑थायै त्वा स्व॒धायै॒ त्वाऽरि॑ष्टो॒ अर्जु॑नो म॒रुतां॑ प्रस॒वेन॑ ज॒यापा॑म॒ मन॑सा॒ समि॑न्द्रि॒येण॑॥२१॥

इन्द्र॑स्य। वज्रः॑। अ॒सि॒। मि॒त्रावरु॑णयोः। त्वा॒। प्र॒शा॒स्त्रो॑रिति॑ प्रऽशा॒स्त्रोः। प्र॒शिषेति॑ प्र॒ऽशिषा॑। यु॒न॒ज्मि॒। अव्य॑थाय। त्वा॒। स्व॒धायै॑। त्वा॒। अरि॒ष्टः॑। अर्जु॑नः। म॒रुता॑म्। प्र॒स॒वेनेति॑ प्रऽस॒वेन॑। ज॒य॒। आपा॑म। मन॑सा। सम्। इ॒न्द्रि॒येण॑ ॥२१॥

Mantra without Swara
इन्द्रस्य वज्रोसि मित्रावरुणयोस्त्वा प्रशास्त्रोः प्रशिषा युनज्मि । अव्यथायै त्वा स्वधायै त्वारिष्टोऽअर्जुनो मरुताम्प्रसवेन जयापाम मनसा समिन्द्रियेण ॥

इन्द्रस्य। वज्रः। असि। मित्रावरुणयोः। त्वा। प्रशास्त्रोरिति प्रऽशास्त्रोः। प्रशिषेति प्रऽशिषा। युनज्मि। अव्यथाय। त्वा। स्वधायै। त्वा। अरिष्टः। अर्जुनः। मरुताम्। प्रसवेनेति प्रऽसवेन। जय। आपाम। मनसा। सम्। इन्द्रियेण॥२१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे राजन् ! आप (अरिष्ट:) हिंसा रहित, (अर्जुनः) प्रशस्त रूपवान् हो, (इन्द्रस्य) परम ऐश्वर्य के (वज्रः) विज्ञापक उपदेशक (असि) हो । सो (त्वा) आपको (अव्यथायै) पीड़ा दूर करने के लिये (प्रशास्त्रोः) सबके प्रशासक (मित्रावरुणयोः) सभापति और सेनापति सम्बन्धी (प्रशिषा) शिक्षा से मैं (युनज्मि) समाहित करता हूँ ।
(मरुताम्) ऋत्विजों की (प्रसवेन) प्रेरणा से (स्वधायै) अपनी वस्तुओं को धारण करना रूप राजनीति प्राप्ति के लिये (त्वा) आपको (युनज्मि) समाहित करता हूँ (मनसा) मननशील (इन्द्रियेण) जीव के द्वारा प्रीतिपूर्वक (त्वा) आपको हम (समापाम) प्राप्त करें। सो आप (जय) दुष्टों को जीत कर उन्हें श्रेष्ठ बनाओ ।। १० । २१ ।।
Essence
विद्वान् लोग राजा और प्रजा जनों को धर्म के लिये सदा शिक्षा करें, जिससे ये लोग हिंसात्मक और राजनीति से विरुद्ध कर्म न करें ।
सब ओर से बल को प्राप्त करके शत्रुओं को जीतें, जिससे कभी भी ऐश्वर्य की हानि न होवे ॥ १० । २१ ।।
Subject
फिर विद्वान् पुरुषों को क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है ।।
Refrences
(अर्जुनः) यहां 'अर्श आदिभ्योऽच्’ [अ० ५ । २ । १२७ ] इस सूत्र से 'अच्’ प्रत्यय है। 'अर्जुन' शब्द निघं० (३ । ७) में रूप-नामों में पढ़ा है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ४ । ३ । ४-१०) में की गई है ।। १० । २१ ।।
Commentary Essence
विद्वानों का कर्त्तव्य--सभापति राजा और सेनापति सबके प्रशासक होते हैं। विद्वान् लोग उन्हें ऐसी शिक्षा करें कि जिससे वे अहिंसक, प्रशस्त रूपवान् और परम ऐश्वर्य के प्रकाशक हों। वे धार्मिक जनों को पीड़ित न करें तथा राजनीति के विरुद्ध कर्मों का आचरण न करें। मननशील पुरुषों से बल को प्राप्त करके दुष्ट शत्रुओं को जीतें और उन्हें श्रेष्ठ बनावें, जिससे उनके ऐश्वर्य की हानि कभी न हो ।। १० । २१ ।।