Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 20

34 Mantra
10/20
Devata- क्षत्रपतिर्देवता Rishi- देवावात ऋषिः Chhand- भूरिक अतिधृति, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्रजा॑पते॒ न त्वदे॒तान्य॒न्यो विश्वा॑ रू॒पाणि॒ परि॒ ता बभू॑व। यत्का॑मास्ते जुहु॒मस्तन्नो॑ऽअस्त्व॒यम॒मुष्य॑ पि॒ताऽसाव॒स्य पि॒ता व॒यꣳ स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णा स्वाहा॑। रुद्र॒ यत्ते॒ क्रिवि॒ परं॒ नाम॒ तस्मि॑न् हु॒तम॑स्यमे॒ष्टम॑सि॒ स्वाहा॑॥२०॥

प्रजा॑पत॒ इति॒ प्रजा॑ऽपते। न। त्वत्। ए॒तानि॑। अ॒न्यः। विश्वा॑। रू॒पाणि॑। परि॑। ता। ब॒भू॒व॒। यत्का॑मा॒ इति॒ यत्ऽका॑माः। ते॒। जु॒हु॒मः। तत्। नः॒। अ॒स्तु॒। अ॒यम्। अ॒मुष्य॑। पि॒ता। अ॒सौ। अ॒स्य। पि॒ता। व॒यम्। स्या॒म॒। पत॑यः। र॒यी॒णाम्। स्वाहा॑। रुद्र॑। यत्। ते॒। क्रिवि॑। पर॑म्। नाम॑। तस्मि॑न्। हु॒तम्। अ॒सि॒। अ॒मे॒ष्टमित्य॑माऽइ॒ष्टम्। अ॒सि॒। स्वाहा॑ ॥२०॥

Mantra without Swara
प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परि ता बभूव । यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नोऽअस्त्वयममुष्य पितासावस्य पिता वयँ स्याम पतयो रयीणाँ स्वाहा । रुद्र यत्ते क्रिवि परन्नाम तस्मिन्हुतमस्यमेष्टमसि स्वाहा ॥

प्रजापत इति प्रजाऽपते। न। त्वत्। एतानि। अन्यः। विश्वा। रूपाणि। परि। ता। बभूव। यत्कामा इति यत्ऽकामाः। ते। जुहुमः। तत्। नः। अस्तु। अयम्। अमुष्य। पिता। असौ। अस्य। पिता। वयम्। स्याम। पतयः। रयीणाम्। स्वाहा। रुद्र। यत्। ते। क्रिवि। परम्। नाम। तस्मिन्। हुतम्। असि। अमेष्टमित्यमाऽइष्टम्। असि। स्वाहा॥२०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (प्रजापते) प्रजा के स्वामी ईश्वर! जो (एतानि) ये जीव, प्रकृति आदि (विश्वा) सब (रूपाणि) इच्छा, रूप आदि गुणों से युक्त पदार्थ हैं [ता] उन्हें (त्वत्) आपसे (अन्यः) भिन्न दूसरा कोई पदार्थ (न परिबभूव) व्याप्त नहीं करता है। अतः (ते) आप से (यत्कामाः) जिस-जिस पदार्थ की कामना वाले होकर हम लोग (जुहुमः) आपकी उपासना करें, वह-वह कामना आपकी कृपा से (नः) हमारे लिए (अस्तु) सिद्ध होवे।
जैसे आप (अमुष्य) परोक्ष जगत् के तथा इस जीव के (पिता) पालक हो [अयम्] सो आप (अयम्) इस प्रत्यक्ष जगत् के (पिता) रक्षक (असि) हो, वैसे हम लोग (स्वाहा) सत्य आचरण से (रयीणाम्) विद्या, चक्रवर्ती राज्य से उत्पन्न लक्ष्मी के (पतयः) पालक स्वामी (स्याम) होवें।
हे (रुद्र) दुष्टों को रुलाने वाले ईश्वर! (ते) आपका जो (क्रिवि) हिंसक (परम्) उत्तम (नाम) नाम है, जिसमें आप (हुतम्) सबको आहुत करने वाले (असि) हो, (अमेष्टम्) घर में पूजा के योग्य (असि) हो, सो आपको हम लोग (स्वाहा) सत्यवाणी से (जुहुमः) ग्रहण करते है ।। १० । २० ।।
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है॥ हे मनुष्यो ! जो सब जगत् में व्याप्त है, सबके प्रति माता-पिता के समान वर्तमान है, दुष्टों को दण्ड देने वाला और उपासना के योग्य है, उस जगदीश्वर की ही उपासना करो। इस प्रकार अनुष्ठान से तुम्हारी सब कामनायें अवश्य सिद्ध होंगी ।। १० । २० ।।
Subject
मनुष्यों को चाहिये कि ईश्वर की उपासना और उसकी आज्ञा पालने से सब कामनाओं को प्राप्त करें, यह उपदेश किया है ।।
Refrences
(क्रिवि) यहाँ वर्ण-व्यत्यय से नकार के स्थान में इकार है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ४ । २ । ८-१०) में की गई है ।। १० । २० ।।
Commentary Essence
१. ईश्वर की उपासना से सब कामनाओं की प्राप्ति--ईश्वर प्रजा का स्वामी है। जो इच्छादि गुणों से युक्त जीव, रूप आदि गुणों से विशिष्ट प्रकृति के पदार्थों को सब ओर से व्याप्त कर रहा है अर्थात् ईश्वर सब जगत् में व्यापक है। जिस-जिस पदार्थ की कामना वाले हम लोग उसकी उपासना करते हैं उसकी कृपा से वह-वह कामना हमारी सिद्ध हो जाती है। ईश्वर परोक्ष और प्रत्यक्ष जगत् का पालक है। वह सबके प्रति माता-पिता के समान वर्ताव करता है। हम लोग ईश्वरोक्त सत्याचरण से विद्या और चक्रवर्ती राज्य से प्राप्त लक्ष्मी के पति बनते हैं।
ईश्वर दुष्टों को रुलाने वाला है अर्थात् दुष्टों को दण्ड देने वाला है इसलिये उसका नाम रुद्र है। पापी जनों का हिंसक होने से उसका नाम 'क्रिवी' है। सृष्टिकाल में सब जगत् को देने वाला और प्रलय समय में सब जगत् को अपने में लेने वाला है अतः ईश्वर 'हुत' कहलाता है। उपासना के योग्य होने से वह 'अमेष्टम्' है । इसलिये सब मनुष्य ईश्वर की ही उपासना करें जिससे सब कामनायें अवश्य सिद्ध हों ।। १० । २० ।।
२. अलङ्कार–इस मन्त्र में उपमावाचक शब्द लुप्त है, अतः वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि ईश्वर सबके प्रति माता-पिता के समान वर्ताव करता है ।। १० । २० ।।