Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 2

34 Mantra
10/2
Devata- वृषा देवता Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- स्वराट ब्राह्मी पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वृष्ण॑ऽऊ॒र्मिर॑सि राष्ट्र॒दा रा॒ष्ट्रं मे॑ देहि॒ स्वाहा॑ वृष्ण॑ऽऊर्मिर॑सि राष्ट्र॒दा रा॒ष्ट्रम॒मुष्मै॑ देहि वृषसे॒नोऽसि राष्ट्र॒दा रा॒ष्ट्रं मे॑ देहि॒ स्वाहा॑ वृषसे॒नोऽसि राष्ट्र॒दा रा॒ष्ट्रम॒मुष्मै॑ देहि॥२॥

वृष्णः॑। ऊ॒र्मिः। अ॒सि॒। रा॒ष्ट्र॒दा इति॑ राष्ट्र॒ऽदाः। रा॒ष्ट्रम्। मे॒। दे॒हि॒। स्वाहा॑। वृष्णः॑। ऊ॒र्मिः। अ॒सि॒। रा॒ष्ट्र॒दा इति॑ राष्ट्रऽदाः। रा॒ष्ट्रम्। अ॒मुष्मै॑। दे॒हि॒। वृ॒ष॒से॒न इति॑ वृषऽसे॒नः। अ॒सि॒। रा॒ष्ट्र॒दा इति॑ राष्ट्र॒ऽदाः। रा॒ष्ट्रम्। मे॒। दे॒हि॒। स्वाहा॑। वृ॒ष॒से॒न इति॑ वृषऽसे॒नः। अ॒सि॒। रा॒ष्ट्र॒दा इति॑ राष्ट्र॒ऽदाः। रा॒ष्ट्रम्। अ॒मुष्मै॑। दे॒हि॒ ॥२॥

Mantra without Swara
वृष्ण ऽऊर्मिरसि राष्ट्रदा राष्ट्रम्मे देहि स्वाहा वृष्णऽऊर्मिरसि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देहि वृषसेनोसि राष्ट्रदा राष्ट्रम्मे देहि स्वाहा । वृषसेनोसि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देह्यर्थेत स्थ ॥

वृष्णः। ऊर्मिः। असि। राष्ट्रदा इति राष्ट्रऽदाः। राष्ट्रम्। मे। देहि। स्वाहा। वृष्णः। ऊर्मिः। असि। राष्ट्रदा इति राष्ट्रऽदाः। राष्ट्रम्। अमुष्मै। देहि। वृषसेन इति वृषऽसेनः। असि। राष्ट्रदा इति राष्ट्रऽदाः। राष्ट्रम्। मे। देहि। स्वाहा। वृषसेन इति वृषऽसेनः। असि। राष्ट्रदा इति राष्ट्रऽदाः। राष्ट्रम्। अमुष्मै। देहि॥२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे राजन् ! क्योंकि आप (वृषणः) सुख की वर्षा करने वाले विज्ञान के (ऊर्मिः) प्राप्त कराने वाले तथा (राष्ट्रदाः) राष्ट्र के दाता (असि) हो, अतः (मे) मुझे (स्वाहा) सत्य नीति से (राष्ट्रम्) राज्य (देहि) दीजिये ।
(वृषणः) सुख की वर्षा करने वाले राज्य के (ऊर्मि:) ज्ञाता तथा (राष्ट्रदाः) राज्य प्रदान करने वाले (असि) हो, सो आप (अमुष्मै) राज्य-पालक को (राष्ट्रम्) न्याय से प्रकाशित राज्य (देहि) दीजिये ।
(राष्ट्रदाः) राजाओं को कार्य प्रदान करने वाले, और (वृषसेनः) बलवान् सेना वाले (असि) हो, सो (स्वाहा) उत्तम वाणी से [मे] मुझे (राष्ट्रम्) राज्य (देहि) दीजिये ।
(राष्ट्रदा वृषसेनः) राजाओं के कार्यदाता तथा हृष्ट-पुष्ट सेना वाले आप (अमुष्मै) उस परोक्ष जन को (राष्ट्रम्) राज्य (देहि) दीजिये ।। १०। २ ॥
Essence
जो मनुष्य दुष्टों को जीत कर, प्रत्यक्ष श्रेष्ठों का सत्कार करके उन्हें राज्य-अधिकार एवं राज्य-लक्ष्मी प्रदान करता है, वह चक्रवर्ती सम्राट् बनने के योग्य होता है ॥ १० । २ ॥
Subject
अब विद्वान् लोग कैसे राजा से क्या-क्या मांगें, यह उपदेश किया है ।।
Refrences
(ऊर्मिः) यहाँ 'अर्तेऔररूच्च' उणा० (४।४४) इस सूत्र से 'ऋ' धातु से 'मि’ है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ३ । ४ । ५-६) में की गई है ।। १० । २ ।।
Commentary Essence
विद्वान् लोग किस राजा से क्या-क्या माँगें--जो राजा सुख की वर्षा करने वाले विज्ञान का प्रापक हो, राष्ट्र का दाता हो, उससे विद्वान् लोग सत्य नीति से राज्य की याचना करें । जो राजा सुख की वर्षा करने वाले राज्य का ज्ञाता हो, और राज्य प्रदान करने वाला हो, उससे राज्य के पालक विद्वान् लोग न्याय से प्रकाशित राज्य की याचना करें। जो राजा अन्य राजाओं को कार्य प्रदान करने वाला तथा बलवान् सेना वाला हो उससे मधुर वाणी से राज्य की याचना करें ।
जो राजा दुष्टों को जीतकर और श्रेष्ठों का सत्कार करके उन्हें राज्याधिकार और राज्यलक्ष्मी प्रदान करने वाला हो उसे चक्रवर्ती सम्राट् बनावें ।। १० । २ ।।