Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 19

34 Mantra
10/19
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- देवावात ऋषिः Chhand- विराट् ब्राह्मी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र पर्व॑तस्य वृष॒भस्य॑ पृ॒ष्ठान्नाव॑श्चरन्ति स्व॒सिच॑ऽइया॒नाः। ताऽआव॑वृत्रन्नध॒रागुद॑क्ता॒ऽअहिं॑ बु॒ध्न्यमनु॒ रीय॑माणाः। विष्णो॑र्वि॒क्रम॑णमसि॒ विष्णो॒र्विक्रा॑न्तमसि॒ विष्णोः॑ क्रा॒न्तम॑सि॒॥१९॥

प्र। पर्व॑तस्य। वृ॒ष॒भस्य॑। पृ॒ष्ठात्। नावः॑। च॒र॒न्ति॒। स्व॒सिच॒ इति॑ स्व॒ऽसिचः॑। इया॒नाः। ताः। आ। अ॒व॒वृ॒त्र॒न्। अ॒ध॒राक्। उद॑क्ता॒ इत्युत्ऽअ॑क्ताः। अहि॑म्। बु॒ध्न्य᳖म्। अनु॑। रीय॑माणाः। विष्णोः॑। वि॒क्रम॑ण॒मिति॑ वि॒ऽक्रम॑णम्। अ॒सि॒। विष्णोः॑। विक्रा॑न्त॒मिति॒ विऽक्रा॑न्तम्। अ॒सि॒। विष्णोः॑। क्रा॒न्तम्। अ॒सि॒ ॥१९॥

Mantra without Swara
प्र पर्वतस्य वृषभस्य पृष्ठान्नावश्चरन्ति स्वसिचऽइयानाः । ताऽआववृत्रन्नधरागुदक्ता अहिम्बुध्न्यमनु रीयमाणाः । विष्णोर्विकर्मणमसि विष्णोर्विक्रान्तमसि विष्णोः क्रान्तमसि ॥

प्र। पर्वतस्य। वृषभस्य। पृष्ठात्। नावः। चरन्ति। स्वसिच इति स्वऽसिचः। इयानाः। ताः। आ। अववृत्रन्। अधराक्। उदक्ता इत्युत्ऽअक्ताः। अहिम्। बुध्न्यम्। अनु। रीयमाणाः। विष्णोः। विक्रमणमिति विऽक्रमणम्। असि। विष्णोः। विक्रान्तमिति विऽक्रान्तम्। असि। विष्णोः। क्रान्तम्। असि॥१९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे राजा के शिल्पी ! यदि तुझ से बनाई गई जो (स्वसिच:) अपने सेवक जनों से जल से सींची हुई, (इयानाः) गति करने वाली, ( उदक्ताः) बार-बार ऊपर जाने वाली, (अहिं बुध्न्यम्) अन्तरिक्ष में विद्यमान मेघ के (अनु) पीछे (रीयमाणाः) चलाने से गति करती हुई (नाव:) सागर के ऊपर चलने वाली नौकाओं के समान जो विमान हैं वे (वृषभस्य) वर्षा करने वाले (प्रपर्वतस्य) मेघ के (पृष्ठात्) ऊपर (प्रचरन्ति) विचरण करते हैं ।
जिन नौकाओं से तू (विष्णोः) व्यापक ईश्वर के समान (विक्रान्तम्) विविध गति वाला (असि) है, (विष्णोः) व्यापक वायु के समान (विक्रमणम्) विशेष गति वाला (असि) है, (विष्णोः) व्यापक विद्युत् के समान (क्रान्तम्) गति का आधार (असि) है। जो नौकायें (अधराक्) नीचे (आववृत्रन्) मेघ के समान विचरण करती हैं उन्हें तू सिद्ध कर ।। १० । १९ ।।
Essence
जैसे मेघ वर्षा करके भूतल को प्राप्त होकर आकाश को प्राप्त होता है, वह जल नदियों में जाकर अन्त में समुद्र में पहुँचता है, उसकी पीठ पर नौकायें चलती हैं।
जिन नौकाओं के ऊपर और नीचे के भाग में जल रहता है वैसे सब शिल्पी लोग विमान, और नौका रूप यान बना कर स्थल, जल और आकाश के मार्ग से अभीष्ट देश में यथेच्छ यातायात करें ।
जब तक यानों को सिद्ध नहीं करते तब तक द्वीप-द्वीपान्तर में कोई नहीं जा सकता ।
जैसे पक्षी इस शरीरमय संघात को लेकर प्रकाश में उड़ते हैं, वैसे चतुर शिल्पी लोग इस आकाश में यानों से गति करें ।। १० । १९ ।।
Subject
फिर इस जगत् में राजा और प्रजाजनों को किस प्रकार के यान बनाने चाहियें, यह उपदेश किया है ।।
Refrences
(पर्वतस्य) 'पर्वत' शब्द निघं० (१ । १०) में मेघ-नामों में पढ़ा है। (आववृत्रन्) यहाँ सुबन्त से आचार-अर्थ में 'क्विप्' प्रत्यय है। इस मन्त्र की व्याख्या शतर (५।४।२। ५-६) में की गई है ।। १० । १९ ।।
Commentary Essence
राजा और प्रजा कैसे यान बनावें--राजा और शिल्पी प्रजा जनों को उचित है कि वे जल से सिक्त अर्थात् जल में चलने वाले नौका आदि यानों की रचना करें, जो नौकायें अन्तरिक्ष में विद्यमान मेघ के पीछे संचालन से चलती हैं। जो वर्षा करने वाले मेघ की पीठ पर विचरण करती हैं, इसका अभिप्राय यह है कि मेघ वर्षा करता है, वह जल नदियों में जाता है और अन्त में समुद्र में पहुँच जाता है। समुद्र की पीठ पर जो नौकायें चलती हैं वे वास्तव में मेघ की पीठ पर ही चल रही हैं। क्योंकि वह जल मेघों का ही है ।
शिल्पी जन आकाश में गति करने वाले विमानों की भी रचना करें। स्थल-यानों को भी सिद्ध करें। जो यान व्यापक ईश्वर, व्यापक वायु और व्यापक विद्युत् के समान पथ को व्याप्त करने वाले हों। जिनसे स्थल, जल और आकाश के मार्ग से अभीष्ट देश में यथेच्छ यातायात करें। जैसे पक्षी अपने शरीर को लेकर आकाश में उड़ जाते हैं, वैसे चतुर शिल्पी लोग यानों के द्वारा आकाश में गमन करें।
राजा और प्रजा जन जब तक यानों को सिद्ध नहीं करते तब तक द्वीप-द्वीपान्तर में कदापि नहीं जा सकते, अतः नौका और विमान आदि यानों को सिद्ध करें ।। १० । १९।।