Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 18

34 Mantra
10/18
Devata- यजमानो देवता Rishi- देवावात ऋषिः Chhand- स्वराट ब्राह्मी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मं दे॑वाऽअसप॒त्नꣳ सु॑वध्वं मह॒ते क्ष॒त्रा॑य मह॒ते ज्यैष्ठ्या॑य मह॒ते जान॑राज्या॒येन्द्र॑स्येन्द्रि॒याय॑। इ॒मम॒मुष्य॑ पु॒त्रम॒मुष्यै॑ पु॒त्रम॒स्यै वि॒शऽए॒ष वो॑ऽमी॒ राजा॒ सोमो॒ऽस्माकं॑ ब्राह्म॒णाना॒ राजा॑॥१८॥

इ॒मम्। दे॒वाः॒। अ॒स॒प॒त्नम्। सु॒व॒ध्व॒म्। म॒ह॒ते। क्ष॒त्राय॑। म॒ह॒ते। ज्यैष्ठ्या॑य। म॒ह॒ते। जान॑राज्या॒येति॒ जान॑ऽराज्याय। इन्द्र॑स्य। इ॒न्द्रि॒याय॑। इ॒मम्। अ॒मुष्य॑। पु॒त्रम्। अ॒मुष्यै॑। पु॒त्रम्। अ॒स्यै। वि॒शे। ए॒षः। वः॒। अ॒मी॒ऽइत्य॑मी। राजा॑। सोमः॑। अ॒स्माक॑म्। ब्रा॒ह्म॒णाना॑म्। राजा॑ ॥१८॥

Mantra without Swara
इमन्देवाऽअसुपत्नँ सुवध्वम्महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्दियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश एष वोमी राजा सोमोस्माकम्ब्राह्मणानाँ राजा ॥

इमम्। देवाः। असपत्नम्। सुवध्वम्। महते। क्षत्राय। महते। ज्यैष्ठ्याय। महते। जानराज्यायेति जानऽराज्याय। इन्द्रस्य। इन्द्रियाय। इमम्। अमुष्य। पुत्रम्। अमुष्यै। पुत्रम्। अस्यै। विशे। एषः। वः। अमीऽइत्यमी। राजा। सोमः। अस्माकम्। ब्राह्मणानाम्। राजा॥१८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (देवाः) वेदशास्त्रों के वेत्ता सेनापति लोगो ! तुम--जो (एषः) यह उपदेशक वा सेनापति (वः) आपके पालन के लिये है और (अस्माकम्) हम (ब्राह्मणानाम्) ब्रह्म और वेद के भक्त लोगों के लिये (राजा) सर्वत्र विद्या, धर्म और सुशिक्षा का प्रकाशक है। और जो (अमी) वे धार्मिक राजपुरुष हैं, उनका (सोमः) शुभ गुणों वाला (राजा) वेद और ईश्वरोपासना से प्रकाशमान राजा है। सो इस (अमुष्य) श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न राजपूत के (पुत्रम्) पुत्रों को तथा (अमुष्यै) प्रशंसनीय राजपुत्री के (पुत्रम्) अपने पवित्र गुण, कर्म, स्वभाव से माता-पिता के पालक पुत्र को; (अस्यै) इस सुशिक्षा के करने योग्य (विशे) प्रजा के (महते) सत्कार के योग्य (क्षत्राय) क्षत्रिय कुल के लिये, (महते) सत्कार के योग्य (ज्यैष्ठ्याय) विद्यावृद्ध और धर्मवृद्ध जनों के लिये, (महते) सत्कार के योग्य (जानराज्याय) माण्डलिक राजा जनों के ऊपर प्रभावी होने के लिये, (इन्द्रस्य) ऐश्वर्य से युक्त धनवान् के (इन्द्रियाय) धन की वृद्धि के लिये (असपत्नम्) अजातशत्रु राजा को (सुवध्वम्) प्रेरित करो ।। १० । १८ ।।
Essence
यदि उपदेशक और राजपुरुष सबकी उन्नति करना चाहे तो प्रजा और राजा लोग राजपुरुषों की उन्नति करना क्यों न चाहें। यदि राजा और प्रजा जन वेद रूप ईश्वर की आज्ञा को छोड़कर स्वेच्छा से चलें तो उनकी अवनति क्यों न हो ।। १०। १८।।
Subject
सत्य के उपदेशक विद्वानों को चाहिये कि बाल्यावस्था से लेके अच्छी शिक्षा से राजाओं की कन्या और पुत्रों को श्रेष्ठ आचार से युक्त करें, यह उपदेश किया है ।।
Refrences
(अमुष्यै) यहाँ षष्ठी अर्थ में चतुर्थी विभक्ति है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ३ । ३ । १२ तथा ५ । ४ । २ । ३) में की गई है ।। १० । १८ ।।
Commentary Essence
विद्वानों की राजकुमारों को शिक्षा--वेदशास्त्रों का वेत्ता सेनापति राजा क्षत्रियों तथा ब्रह्म और वेद के भक्त ब्राह्मण जनों का पालक होकर सर्वत्र विद्या, धर्म और सुशिक्षा से प्रकाशित करने वाला होता है। और जो धार्मिक राजपुरुष हैं उन्हें अपने वेद और ईश्वरोपासना आदि शुभ गुणों से प्रकाशित करता है।
सत्य का उपदेश करने वाले विद्वानों का कर्त्तव्य है कि वे उक्त शुभ गुणों से प्रकाशमान राजा के कुमार और कुमारियों को उत्तम शिक्षा करें कि तुम श्रेष्ठ आचरण वाले बनो। पवित्र गुण, कर्म, स्वभाव से युक्त होकर माता-पिता के पालक बनो। प्रजा को सुशिक्षा प्रदान करो । महान् क्षत्रिय कुल के रक्षक बनो। सत्कार के योग्य विद्यावृद्ध और धर्मवृद्ध जनों के पालक बनो । राजा होकर माण्डलिक राजा जनों के ऊपर अपना प्रभाव रखो। ऐश्वर्य सम्पन्न धनवानों के धन की वृद्धि करो। इन सब कार्यों की सिद्धि के लिये तुम अजातशत्रु बनो ।
इस प्रकार विद्वान् उपदेशक तथा सेनापति आदि राजपुरुष सब की उन्नति की कामना करें। प्रजा और राजा भी राजपुरुषों की सदा उन्नति चाहें । वे इस वेदाज्ञा एवं ईश्वराज्ञा को छोड़कर स्वेच्छा से चलेंगे तो उनकी अवनति ही होगी ।। १० । १८ ।।