Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 16

34 Mantra
10/16
Devata- क्षत्रपतिर्देवता Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- स्वराट आर्षी जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
हिर॑ण्यरूपाऽउ॒षसो॑ विरो॒कऽउ॒भावि॑न्द्रा॒ऽउदि॑थः॒ सूर्यश्च॑। आरो॑हतं वरुण मित्र॒ गर्त्तं॒ तत॑श्चक्षाथा॒मदि॑तिं॒ दितिं॑ च मि॒त्रोऽसि॒ वरु॑णोऽसि॥१६॥

हिर॑ण्यरूपा॒विति हिर॑ण्यऽरूपौ। उ॒षसः॑। वि॒रो॒क इति॑ विऽरो॒के। उ॒भौ। इ॒न्द्रौ॒। उत्। इ॒थः॒। सूर्यः॑। च॒। आ। रो॒ह॒त॒म्। व॒रु॒ण॒। मि॒त्र॒। गर्त्त॑म्। ततः॑। च॒क्षा॒था॒म्। अदि॑तिम् दिति॑म्। च॒। मि॒त्रः। अ॒सि॒। वरु॑णः। अ॒सि॒ ॥१६॥

Mantra without Swara
हिरण्यरूपाऽउषसो विरोकऽउभाविन्द्राऽउदिथः सूर्यश्च । आ रोहतँवरुण मित्र गर्तन्ततश्चक्षाथामदितिन्दितिञ्च मित्रो सि वरुणो सि ॥

हिरण्यरूपाविति हिरण्यऽरूपौ। उषसः। विरोक इति विऽरोके। उभौ। इन्द्रौ। उत्। इथः। सूर्यः। च। आ। रोहतम्। वरुण। मित्र। गर्त्तम्। ततः। चक्षाथाम्। अदितिम् दितिम्। च। मित्रः। असि। वरुणः। असि॥१६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (मित्र!) सबके मित्र उपदेशक! आप (मित्रः) सुखदायक (असि) हो, हे (वरुण) शत्रुओं का उच्छेद करने वाले श्रेष्ठ सेनापते! आप (वरुणः) सब से उत्तम (असि) हो, (ततः) इसलिये, तुम दोनों (गर्त्तम्) उपदेशक के घर (आरोहतम्) जाओ, (अदितिम्) अविनाशी और (दितिम्) नाशवान् पदार्थों का (चक्षाथाम्) उपदेश करो ।
हे (हिरण्यरूपौ) ज्योतिःस्वरूप (इन्द्रौ) परम ऐश्वर्य के उत्पादक उपदेशक और सेनापते ! जैसे (विरोके) विविध रुचिकर व्यवहार में (सूर्यः) सूर्य और (चन्द्रः) चन्द्रमा जैसे (उषसः) ज्योतियों को प्रकाशित करते हैं, वैसे तुम दोनों (उदिथः) उदय को प्राप्त होवो और विद्याओं को प्रकाशित करो ॥ १० । १६ ।।
Essence
जिस देश में सूर्य और चन्द्रमा के समान उपदेशक लोग व्याख्यानों से सब विद्याओं को प्रकाशित करते हैं, वहाँ सत्य और असत्य पदार्थों के बोध से युक्त होने से कोई भी अविद्या से मोहित नहीं होता, और जहाँ यह नहीं है, वहाँ अन्ध-परम्परा में ग्रस्त लोग प्रतिदिन अवनति को प्राप्त होते हैं ।। १० । १६ ।।
Subject
अब विद्वानों को चाहिये कि वे निष्कपट होकर और अज्ञानी पुरुषों के लिये सत्य का उपदेश करके उनको मेधावी विद्वान् बनावें, यह उपदेश किया है ।।
Refrences
(गर्त्तम् ) यह शब्द निघं० ( ३ । ४) में गृह-नामों में पढ़ा है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ४ । १ । १५-१७) में की गई है ।। १० । १६ ।।
Commentary Essence
विद्वान् निष्कपटता से उपदेश करें--विद्वान् उपदेशक सबके मित्र हैं, सबको सुख देने वाले हैं। शत्रुओं का उच्छेद करने वाला सेनापति सर्वोत्तम पुरुष है। विद्वान् उपदेशक तथा सेनापति दोनों मिलकर उपदेशक के घर जावें । वहाँ दोनों मिलकर अविनाशी और नाशवान् अर्थात् नित्य और अनित्य पदार्थों के विषय में वार्तालाप करें। इस प्रकार ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों मिलकर नित्य=ईश्वर, जीव, प्रकृति तथा अनित्य भौतिक जगत् के पदार्थों की विद्या को ग्रहण करें।
विद्वान् उपदेशक (ब्राह्मण) और सेनापति (क्षत्रिय) दोनों विद्या की ज्योति से प्रकाशित हैं, ज्योतिस्वरूप हैं, परम ऐश्वर्य के उत्पादक हैं। जैसे सूर्य और चन्द्र ज्योति को प्रकाशित करते हैं, वैसे जिस देश में विद्वान् उपदेशक अपने व्याख्यानों से विद्याओं को प्रकाशित करते हैं, वहाँ सत्य और असत्य का बोध हो जाने से कोई भी मनुष्य अविद्या से मोहित नहीं होता। और जहाँ विद्वान् उपदेशक नहीं होते वहाँ अन्ध परम्परा में ग्रस्त होकर लोग प्रतिदिन अवनति को ही प्राप्त होते हैं ।
अतः विद्वानों का कर्त्तव्य है कि वे निष्कपट भाव से अज्ञानी लोगों को सत्य का उपदेश करके उन्हें मेधावी विद्वान् बनावें ।। १० । १६ ।।