Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 15

34 Mantra
10/15
Devata- मित्रावरुणौ देवते Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- विराट् आर्ची पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सोम॑स्य॒ त्विषि॑रसि॒ तवे॑व मे॒ त्विषि॑र्भूयात्। मृ॒त्योः पा॒ह्योजो॑ऽसि॒ सहो॑ऽस्य॒मृत॑मसि॥१५॥

सोम॑स्य। त्विषिः॑। अ॒सि॒। तवे॒वेति॒ तव॑ऽइव। मे॒। त्विषिः॑। भू॒या॒त्। मृ॒त्योः। पा॒हि॒। ओजः॑। अ॒सि॒। सहः॒। अ॒सि॒। अ॒मृत॑म्। अ॒सि॒ ॥१५॥

Mantra without Swara
सोमस्य त्विषिरसि तवेव मे त्विषिर्भूयात् । मृत्योः पाह्योजोसि सहोस्यमृतमसि ॥

सोमस्य। त्विषिः। असि। तवेवेति तवऽइव। मे। त्विषिः। भूयात्। मृत्योः। पाहि। ओजः। असि। सहः। असि। अमृतम्। असि॥१५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे परम आप्त ईश्वर ! जैसे आप (सोमस्य) ऐश्वर्य के (त्विषिः) दीपक (असि) हो, (ओजः) अनन्त पराक्रम से युक्त (असि) हो, (सहः) अनन्त बलवान् (असि) हो, (अमृतम्) मरण धर्म से रहित (असि) हो; वैसा मैं भी हो होऊँ अर्थात् (तव+इव) आपके समान मेरा (त्विषिः) तेज, (ओजः) पराक्रम, (सहः) बल और (अमृतम्) मृत्यु से निर्भयता (भूयात्) होवे ।
आप (मृत्योः) मृत्यु से (माम्) मेरी (पाहि) रक्षा कीजिये ।। १० । १५ ।।
Essence
हे पुरुषो! जैसे आप राजा लोग अपने प्रति प्रियाचरण चाहते हैं, वैसे प्रजा के लिये भी चाहें, और जैसे प्रजा राजपुरुषों की रक्षा करती है, वैसे राजपुरुष प्रजाजनों की सदा रक्षा करें ॥ १० । १५ ।।
Subject
राजा और प्रजापुरुषों को उचित है कि ईश्वर के समान वर्ताव करके आपस में एक-दूसरे की रक्षा करें, यह उपदेश किया है।।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ४ । १ । ११-१४) में की गई है। १० । १५ ।।
Commentary Essence
राजा और प्रजा का वर्ताव-- परम आप्त जगदीश्वर जैसे ऐश्वर्य का प्रकाशक है, अनन्त पराक्रम से युक्त है, अनन्त बलवान् है, अमृत अर्थात् मरणधर्म से रहित है, वैसे राजा और प्रजाजनों को उचित है कि वे भी ऐश्वर्य के प्रकाशक, पराक्रमी, बलवान् और मृत्यु से निर्भय होवें। से
जैसे आप्त राजा लोग प्रजा से अपने प्रति प्रिय व्यवहार चाहते हैं, वैसे प्रजा के प्रति प्रिय व्यवहार करें। राजा और प्रजा परस्पर मृत्यु आदि दुःखों से रक्षा किया करें ।। १० । १५ ।।