Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 12

34 Mantra
10/12
Devata- यजमानो देवता Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- आर्षी अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्र॒तीची॒मारो॑ह॒ जग॑ती त्वावतु वैरू॒पꣳ साम॑ सप्तद॒श स्तोमो॑ व॒र्षाऽऋ॒तुर्विड् द्रवि॑णम्॥१२॥

प्र॒तीची॑म्। आ। रो॒ह॒। जग॑ती। त्वा॒। अ॒व॒तु॒। वै॒रू॒पम्। साम॑। स॒प्त॒द॒श इति॑ सप्तऽद॒शः। स्तोमः॑। व॒र्षाः। ऋ॒तुः। विट्। द्रवि॑णम् ॥१२॥

Mantra without Swara
प्रतीचीमारोह जगती त्वावतु वैरूपँ साम सप्तदश स्तोमो वर्षाऽऋतुविड्द्रविणमुदीचीमा रोह ॥

प्रतीचीम्। आ। रोह। जगती। त्वा। अवतु। वैरूपम्। साम। सप्तदश इति सप्तऽदशः। स्तोमः। वर्षाः। ऋतुः। विट्। द्रविणम्॥१२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे राजन्! (त्वा) आपको (जगती) जगती छन्द से प्रतिपादित पदार्थ, (वैरूपम् ) विविध रूपों वाला (साम) सामवेद का अंश (सप्तदशः) पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच विषय, पाँच महाभूत, कार्य और कारण--ये सत्रह (स्तोमः) स्तुति योग्य पदार्थ, (ऋतुर्वर्षाः) वर्षा ऋतु, (विट्) वैश्यजन और ( द्रविणम्) द्रव्य (अवतु) प्राप्त होवें। सो आप (प्रतीचीम्) पश्चिम दिशा पर (आरोह) चढ़ाई करो, और धन को प्राप्त करो ।। १० । १२ ॥
Essence
जो राजपुरुष राजनीति से वैश्यों को उन्नत करते हैं वे श्री (धन) को प्राप्त करते हैं ।। १० । १२ ।।
Subject
राजपुरुषों को चाहिए कि वैश्य कुल को नित्य बढ़ावें, यह उपदेश किया है ॥
Refrences
इस मंत्र की व्याख्या शत० (५ । ४ । १ । ५) में की गई है ।। १० । १२ ।।
Commentary Essence
राजपुरुष वैश्य कुल को बढ़ावें--राजपुरुषों को चाहिये कि वे जगती छन्द से प्रतिपादित पदार्थों को, विविध रूपों वाले सामवेद के भाग को, पाँच कर्म इन्द्रियाँ (पाणि, पाद, पायु, उपस्थ, जिह्वा), पाँच विषय (गन्ध, रूप, रस, स्पर्श, शब्द), पाँच महाभूत (पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), कार्य (स्थूल जगत्), कारण (स्थूल जगत् का कारण प्रकृति)-- इस सतरह प्रकार के स्तोम को और वर्षा ऋतु को प्राप्त करें। राजा लोग राजनीति से वैश्य कुल की वृद्धि करें और उससे नाना प्रकार के द्रव्य और धन को प्राप्त करें ॥ १० । १२ ।।