Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 11

34 Mantra
10/11
Devata- यजमानो देवता Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- आर्ची पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
दक्षि॑णा॒मारो॑ह त्रि॒ष्टुप् त्वा॑वतु बृ॒हत्साम॑ पञ्चद॒श स्तोमो॑ ग्री॒ष्मऽऋ॒तुः क्ष॒त्रं द्रवि॑णम्॥११॥

दक्षि॑णाम्। आ। रो॒ह॒। त्रि॒ष्टुप्। त्रि॒स्तुबिति॑ त्रि॒ऽस्तुप्। त्वा॒। अ॒व॒तु॒। बृ॒हत्। साम॑। प॒ञ्च॒द॒श इति॑ पञ्चऽद॒शः। स्तोमः॑। ग्री॒ष्मः। ऋ॒तुः। क्ष॒त्रम्। द्रवि॑णम् ॥११॥

Mantra without Swara
दक्षिणामारोह त्रिष्टुप्त्वावतु बृहत्साम पञ्चदश स्तोमो ग्रीष्मऽऋतुः क्षत्रन्द्रविणन्प्रतीचीमारोह ॥

दक्षिणाम्। आ। रोह। त्रिष्टुप्। त्रिस्तुबिति त्रिऽस्तुप्। त्वा। अवतु। बृहत्। साम। पञ्चदश इति पञ्चऽदशः। स्तोमः। ग्रीष्मः। ऋतुः। क्षत्रम्। द्रविणम्॥११॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वान् राजन् ! (त्वा) आपको (त्रिष्टुप् छन्दः) त्रिष्टुप् छन्द से विहित विज्ञान, (बृहत्) महान् (साम) सामवेद का भाग (पञ्चदश) पाँच प्राण, पाँच इन्द्रियां, पाँच भूत--ये पन्द्रह (स्तोमः) स्तुति योग्य पदार्थ, (ग्रीष्म ऋतु) ग्रीष्म ऋतु (क्षत्रम्) क्षत्रिय धर्म का रक्षक कुल, और (द्रविणम्) राज्य से उत्पन्न द्रव्य (अवतु) प्राप्त होवे । सो आप (दक्षिणाम्) दक्षिण दिशा में (आरोह) चढ़ाई करो, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करो ।। १० । ११ ।।
Essence
जो राजा विद्या को प्राप्त होकर क्षत्रिय कुल को बढ़ाता है वही शत्रुओं से कभी अपमानित नहीं होता है ।। १० । ११ ।।
Subject
फिर वह सभापति राजा क्या करके क्या करे, यह उपदेश किया है ।।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ४ । १ । ४) में की गई है ।। १० । ११ ।।
Commentary Essence
सभापति राजा क्या करके क्या करे-- विद्वान् सभापति राजा त्रिष्टुप् आदि छन्दों द्वारा विहित विज्ञान को प्राप्त करके, महान् सामवेद के भाग को जानकर, पाँच प्राण (प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान), पाँच इन्द्रियाँ (घ्राण, रसना, चक्षु, त्वचा, श्रोत्र), पाँच भूत (पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश)--इन पन्द्रह पदार्थों की स्तुति=यथार्थ गुणों को समझ कर पूर्ण विद्वान होवे । क्षत्रिय धर्म के रक्षक कुल को बढ़ावे । राज्य से उत्पन्न द्रव्य को प्राप्त करे। इस प्रकार साधन सम्पन्न होकर राजा शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे। जो राजा ऐसा करता है वह शत्रुओं से कभी तिरस्कृत नहीं होता ।। १० । ११ ।।