Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 1

34 Mantra
10/1
Devata- आपो देवताः Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒पो दे॒वा मधु॑मतीरगृभ्ण॒न्नर्ज॑स्वती राज॒स्वश्चिता॑नाः। याभि॑र्मि॒त्रावरु॑णाव॒भ्यषि॑ञ्च॒न् याभि॒रिन्द्र॒मन॑य॒न्नत्यरा॑तीः॥१॥

अ॒पः। दे॒वाः। मधु॑मती॒रिति॒ मधु॑ऽमतीः। अ॒गृ॒भ्ण॒न्। ऊर्ज॑स्वतीः। राज॒स्व᳕ इति॑ राज॒ऽस्वः᳖। चिता॑नाः। याभिः॑। मि॒त्रावरु॑णौ। अ॒भि। असि॑ञ्चन्। याभिः॑। इन्द्र॑म्। अन॑यन्। अति॑। अरा॑तीः ॥१॥

Mantra without Swara
अपो देवा मधुमतीरगृभ्णन्नूर्जस्वती राजस्वश्चितानाः । भिर्मित्रावरुणावभ्यषिञ्चन्याभिरिन्द्रमनयन्नत्यरातीः ॥

अपः। देवाः। मधुमतीरिति मधुऽमतीः। अगृभ्णन्। ऊर्जस्वतीः। राजस्व इति राजऽस्वः। चितानाः। याभिः। मित्रावरुणौ। अभि। असिञ्चन्। याभिः। इन्द्रम्। अनयन्। अति। अरातीः॥१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (देवाः) विद्वान् लोग (याभिः) जिन क्रियाओं से (मित्रावरुणौ) प्राण और उदान को (अभ्यसिञ्चन्) सींचते हैं, और (याभिः) जिन क्रियाओं से (इन्द्रम्) विद्युत् को तथा (अरातीः) शत्रुओं को (अति+अनयन्) ग्रहण करते हैं, उन क्रियाओं से (मधुमतीः) प्रशस्त मधुर आदि गुणों से युक्त (ऊर्जस्वतीः) बल-पराक्रम को प्रदान करने वाले, (चितानाः) चेतना देने वाले (राजस्वः) राजा बनाने वाले (अपः) जल वा प्राणों को (अगृभ्णन्) ग्रहण करो ।। १० । १ ।।
Essence
मनुष्य विद्वानों की सहायता से जल की परीक्षा करके उसका उपयोग करें, शत्रुओं का निवारण करके प्रजा के साथ प्राणों के समान प्रियभाव से वर्ताव करें, जल से उपकार ग्रहण करें ।। १० । १ ।।
Subject
अब मनुष्य विद्वानों का अनुकरण करके पदार्थों से उपयोग ग्रहण करें, यह उपदेश किया है।।
Refrences
(चितानाः) यहाँ विकरण का लुक् और व्यत्यय से आत्मनेपद है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (५ । ३।४।२-३) में की गई है ।। १० । १ ।।
Commentary Essence
मनुष्य विद्वानों का अनुकरण करके पदार्थों से उपयोग लें--जैसे विद्वान् लोग प्राणायाम आदि क्रियाओं से प्राण और उदान को बढ़ाते हैं, शिल्प क्रियाओं से विद्युत् को प्राप्त करते हैं, शत्रुओं का निवारण करते हैं, प्रशस्त मधुर आदि गुणों से युक्त, बल पराक्रम को प्रदान करने वाले, संज्ञा (चेतना) को उत्पन्न करने वाले, अभिषेक से राजा को उत्पन्न करने वाले जल को ग्रहण करते हैं, वैसे सब मनुष्य विद्वानों का अनुकरण करें। उनकी सहायता से जल आदि पदार्थों का परीक्षापूर्वक उपयोग करें, उनसे उपकार ग्रहण करें। राजा लोग शत्रुओं का निवारण करके प्रजा के साथ प्राणों के समान प्रियभाव से वर्ताव करें ।। १० । १ ।।