Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 1 / Mantra 11

31 Mantra
1/11
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- स्वराट् जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
भू॒ताय॑ त्वा॒ नारा॑तये॒ स्वरभि॒विख्ये॑षं॒ दृꣳह॑न्तां॒ दुर्याः॑ पृथि॒व्यामु॒र्वन्तरि॑क्ष॒मन्वे॑मि। पृ॒थि॒व्यास्त्वा॒ नाभौ॑ सादया॒म्यदि॑त्याऽउ॒पस्थेऽग्ने॑ ह॒व्यꣳ र॑क्ष॥११॥

भू॒ताय॑। त्वा॒। न। अरा॑तये। स्वः॑। अ॒भि॒विख्ये॑ष॒मित्य॑भि॒ऽविख्ये॑षम्। दृꣳह॑न्ताम्। दुर्य्याः॑। पृ॒थि॒व्याम्। उ॒रु। अ॒न्तरि॑क्षम्। अनु। ए॒मि॒। पृ॒थि॒व्याः। त्वा॒। नाभौ॑। सा॒द॒या॒मि॒। अदि॑त्याः। उ॒पस्थ॒ इत्यु॒पऽस्थे॑। अग्ने॑। ह॒व्यम् र॒क्ष॒ ॥११॥

Mantra without Swara
भूताय त्वा नारातये । स्वरभिवि ख्येषम् । दृँहन्तां दुर्याः पृथिव्याम् । उर्वन्तरिक्षमन्वेमि । पृथिव्यास्त्वा नाभौ सादयाम्यदित्या उपस्थे ग्ने हव्यँ रक्ष ॥

भूताय। त्वा। न। अरातये। स्वः। अभिविख्येषमित्यभिऽविख्येषम्। दृꣳहन्ताम्। दुर्य्याः। पृथिव्याम्। उरु। अन्तरिक्षम्। अनु। एमि। पृथिव्याः। त्वा। नाभौ। सादयामि। अदित्याः। उपस्थ इत्युपऽस्थे। अग्ने। हव्यम् रक्ष॥११॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
मैं जिस यज्ञ को (भूताय) उत्पन्न प्राणियों के सुख के लिये (अरातये) शत्रु के लिये, बहुत दान करने के लिये अथवा दरिद्रताके विनाश के लिये (अदित्याः) विज्ञान के दीपक वेद की वाणी से आकाश में मेघमण्डल के (उपस्थे) मध्य में (सादयामि) स्थापित करूँ (त्वा) उस कृषि और शिल्प आदि के साधक यज्ञ को (न) कभी न छोडूँ।

हे विद्वानो! आप (पृथिव्याम्) इस विस्तृत भूमि पर (दुर्याः) घरों को (दृंहन्ताम्) बढ़ावें। मैं (पृथिव्याः) शुद्ध विस्तृत भूमि के (नाभौ) मध्य में जिन घरों में (स्वः) सुख एवंजल आदि सुख के साधन हों उन्हें (अभिविख्येषम्) सब ओर देखूँ, और जिस (पृथिव्याम्) विस्तृत भूमि पर (उरु) बहुत (अन्तरिक्षम्) सुख से निवास के लिये अवकाश हो उसे (अन्वेमि) प्राप्त करूँ।

हे (अग्ने) जगत् के स्वामी परमेश्वर! आप हमारे (हव्यम्) परस्पर देने-लेने योग्य क्रियाकौशल वा सुख की सदा (रक्ष) रक्षा करो॥ यह मन्त्र का पहला अन्वय है॥

हे (अग्ने) जगदीश्वर! मैं (भूताय) उत्पन्न प्राणियों के सुख के लिये (अरातये) शत्रु के लिये, बहुत दान करने के लिये अथवा दरिद्रता के विनाश के लिये (पृथिव्याः) शुद्ध विस्तृत भूमि के (नाभौ) मध्य में ईश्वर और उपास्य होने से (स्वः) सुखस्वरूप एवं सुख शान्ति के निमित्त (त्वा) आपको (अभिविख्येषम्) सब ओर विविध प्रकार से देखूं।

आपकी कृपा से ये हमारे (दुर्याः) गृह आदि पदार्थ और वहाँ रहनेवाले मनुष्य आदि प्राणी (दृंहन्ताम्) नित्य वृद्धि को प्राप्त हों।

मैं (पृथिव्याम्) विस्तृत भूमि पर (उरु) बहुत (अन्तरिक्षम्) व्यापक एवं सुख से निवास के लिये अवकाश (उपस्थे) में (त्वा) आपको (अन्वेमि) प्राप्त करूं और (त्वा) आपको (न) कभी न छोडूँ। आप हमारे इस (हव्यम्) परस्पर देने-लेने योग्य क्रियाकौशल वा सुख की सदा (रक्ष) रक्षा कीजिये॥ यह मन्त्र का दूसरा अन्वय है॥

तीसरा अन्वय--मैं शिल्प का ज्ञाता यजमान (भूताय) उत्पन्न प्राणियों के सुख के लिये (अरातये) शत्रु के लिये, बहुत दान करने के लिये अथवा दरिद्रता के विनाश के लिये (पृथिव्याः) शुद्ध विस्तृत भूमि के (नाभौ) मध्य में (त्वा) उस अग्नि की होम और शिल्प विद्या के लिये (सादयामि) स्थापित करता हूँ।

क्योंकि--यह अग्नि (अदित्याः) विज्ञान के दीपक वेद

वेद की वाणी से आकाश में मेघमण्डल के (उपस्थे) मध्य में होम किये हुए द्रव्य की रक्षा करता हैं, इसलिए उसे (पृथिव्याम्) विस्तृत पृथिवी पर (उरु) बहुत (अन्तरिक्षम्) सुख से निवास के लिये अवकाश को (अन्वेमि) प्राप्त करूँ और इसीलिये (त्वा) उस अग्नि को (पृथिव्याम्) विस्तृत भूमि पर (सादयामि) स्थापित करता हूँ।

इस प्रकार करता हुआ मैं (स्वः) सुख वा शान्ति को (अभिविख्येषम्) सब ओर से देखूँ, वैसे ही ये (दुर्याः) प्रासाद महल, घर और वहाँ रहने वाले मनुष्य (दृंहन्ताम्) शुभ गुणों से वृद्धि को प्राप्त हों, ऐसा समझ कर उक्त इस अग्नि को (न) मैं कभीन छोडूँ। यह मन्त्र का तीसरा अन्वय है॥१।११॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेष अलंकार हैं। ईश्वर मनुष्य को आज्ञा देता है--हे मनुष्य! मैं तुझे सब प्राणियों को सुख देने के लिये पृथिवी पर स्थापित करता हूँ।

तू वेदविद्या धर्मानुष्ठान से युक्त, पुरुषार्थ से सुन्दर, सब ऋतुओं में सुखदायक, सब ओर से विशाल अवकाश युक्त घरों को बना कर सुख को प्राप्त कर।

तथा--मेरी सृष्टि में जितने पदार्थ हैं उनके ठीक-ठीक गुणों का अन्वेषण एवं अनेक विद्याओं का प्रत्यक्ष करके उनकी रक्षा और प्रचार सदा किया कर। मनुष्यों को यहां यह समझने योग्य है कि--वे सर्वव्यापक, सब के साक्षी, सब के मित्र, सब सुखों के वर्द्धक, उपासना के योग्य, सर्वशक्तिमान् परमेश्वर को जानकर। सबका उपकार, विविध विद्या की वृद्धि, धर्म में प्रवृत्ति, अधर्म से निवृत्ति, क्रियाकौशल की सिद्धि, यज्ञक्रिया का अनुष्ठान करें। इस मन्त्र में महीधर ने भ्रान्ति से ‘अभिविख्येषम्’इस पद को ‘ख्या प्रकथने’ इस धातु को दर्शन अर्थ में ग्रहण करके सिद्ध किया है जो धात्वर्थ से विरुद्ध होने अशुद्ध है॥१। ११॥
Subject
यज्ञशाला आदि घर कैसे बनाने चाहिए, इस विषय का उपदेश किया जाता है ॥
Commentary Essence
अन्तरिक्ष में जाने वाले (अग्रेपुवः) प्रथम पृथिवी में स्थित सोम औषधि के सेवक (देवीः) दिव्य-गुणों से युक्त (आप) जल हैं, वे पवित्र हों, वैसे शुद्ध पदार्थों की अग्नि में (नयत) आहुति दो। वैसे ही मैं (अद्य) आज (इमाम्१. यज्ञ--सब प्राणियों के लिये सुखदायक, शत्रुओं का विनाशक, दान करने का स्थान, और दारिद्रद्र्य का विनाशक, कृषि और शिल्पविद्या का साधक है। उसे वेदवाणी से आकाश और मेघमण्डल में स्थापित करें। उस यज्ञ का कोई त्याग न करे।

२. यज्ञशाला आदि घर--विद्वान् लोग इस विशाल भूमि पर यज्ञशाला आदि घरों की रचना करें, जिनमें निवास के लिए पर्याप्त स्थान तथा जल आदि सब सुख के साधन हों।

३. ईश्वर-प्रार्थना--हे अग्ने जगदीश्वर! सब प्राणियों के सुख के लिए, शत्रु और दारिद्र्य आदि दुःखों के विनाश के लिये, दान-भावना के विकास के लिये मैं आपको सब ओर देख रहा हूँ क्योंकि आप ही ईश्वर, उपासना के योग्य, सुखस्वरूप, सब सुखों के दाता और जल के समान शान्ति-प्रदाता हो। आपकी कृपा से हमारे घर, उनमें स्थित सब पदार्थ और प्राणी उन्नति को प्राप्त हों। मैं उनमें सुख से निवास के लिये पर्याप्त अवकाश को प्राप्त करूँ तथा आपको सदा समीप समझूं। आपको कभी न छोडूँ। आप हमारे यज्ञ, क्रियाकौशल और सुखों की सदा रक्षा कीजिये।

४. भौतिक अग्नि--शिल्पविद्या के ज्ञाता विद्वान् लोग भौतिक अग्नि को होम और शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये स्थापित करते हैं। यह भौतिक अग्नि सब प्राणियों के लिये सुखदायक, शत्रु और दारिद्रय का विनाशक, दान-भावना का विकासक है। यह अग्नि होम किये हुए द्रव्य को आकाश और मेघमण्डल में स्थापित कर देता है जिससे सब ओर सुख का विस्तार होता है। घर और उनमें रहने वाले मनुष्यों में शुभ गुणों की वृद्धि होती है।

५. महीधर की भ्रान्ति-- महीधर ने ‘अभिविख्येषम्’ पद की सिद्धि ‘ख्या प्रकथने’ धातु से की है और अर्थ ‘दर्शन’ग्रहण किया है। जब ‘ख्या’धातु कहने अर्थ में है तो ‘दर्शन’अर्थ कैसे लिया जा सकता है। महर्षि ने उक्त पद की सिद्धि ‘दर्शन’ अर्थ वाली ‘चक्षिङ्’धातु के स्थान पर ‘ख्याञ्’ आदेश से की है जो सर्वथा उचित है और महीधर की भारी भूल है॥
Special
परमेष्ठी प्रजापतिः। अग्निः=ईश्वरः, भौतिकोऽग्निः॥ स्वराड् जगती॥ निषादः॥