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Yajurveda - Mantra 33

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 33

48 Mantra
7/33
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- आर्षी गायत्री,निचृत् आर्षी उष्णिक् Swara- मध्यमः, षड्जः
Mantra with Swara
ओमा॑सश्चर्षणीधृतो॒ विश्वे॑ देवास॒ऽआग॑त। दा॒श्वासो॑ दा॒शुषः॑ सु॒तम्। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ विश्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्य॑ऽए॒ष ते॒ योनि॒र्विश्वे॑भ्यस्त्वा दे॒वेभ्यः॑॥३३॥

ओमा॑सः। च॒र्ष॒णी॒धृ॒तः॒। च॒र्ष॒णि॒धृ॒त॒ इति॑ चर्षणिऽधृतः। विश्वे॑। दे॒वा॒सः॒। आ। ग॒त॒। दा॒श्वासः॑। दा॒शुषः॑। सु॒तम्। उ॒प॒या॒मगृ॑हीत॒ इत्यु॑पया॒मऽगृ॑हीतः। अ॒सि॒। विश्वे॑भ्यः। त्वा॒। दे॒वेभ्यः॑। ए॒षः। ते॒। योनिः॑। विश्वे॑भ्यः। त्वा॒। दे॒वेभ्यः॑ ॥३३॥

Mantra without Swara
ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवास आ गत । दाश्वाँसो दाशुषः सुतम् । उपयामगृहीतो सि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यऽएष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः ॥

ओमासः। चर्षणीधृतः। चर्षणिधृत इति चर्षणिऽधृतः। विश्वे। देवासः। आ। गत। दाश्वासः। दाशुषः। सुतम्। उपयामगृहीत इत्युपयामऽगृहीतः। असि। विश्वेभ्यः। त्वा। देवेभ्यः। एषः। ते। योनिः। विश्वेभ्यः। त्वा। देवेभ्यः॥३३॥

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Meaning
हे (चर्षणीधृतः) मनुष्यों की पुष्टि-संतुष्टि करने और (ओमासः) उत्तम-उत्तम गुणों से रक्षा करने हारे (विश्वे) समस्त (देवासः) विद्वानो! तुम (दाश्वांसः) उत्कृष्ट ज्ञान को देते हुए (दाशुषः) दान करने वाले उत्तम जन का (सुतम्) जो अच्छे कामों के करने से ऐश्वर्य्य को प्राप्त होने वाला है, उसके (आ, गत) सन्मुख आओ। हे उक्त दानशील पुरुष के पढ़ने वाले बालक! तू (उपयामगृहीतः) पढ़ाने के नियमों से ग्रहण किया हुआ (असि) है, इसलिये (त्वा) तुझे (विश्वेभ्यः) समस्त (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये अर्थात् उनकी सेवा करने को आज्ञा देता हूं, जिसलिये (ते) तेरा (एषः) यह विद्या और अच्छी-अच्छी शिक्षा का संग्रह होना (योनिः) कारण है, इसलिये (त्वा) तुझे (विश्वेभ्यः) समस्त (देवेभ्यः) विद्वानों से विद्या और अच्छी-अच्छी शिक्षा दिलाता हूं॥३३॥
Essence
सब विद्वान् और विदुषी स्त्रियों की योग्यता है कि समस्त बालक और कन्याओं के लिये निरन्तर विद्यादान करें, राजा और धनी आदि लोगों के धन आदि पदार्थों से अपनी जीविका करें और वे राजा आदि धनी जन भी विद्या और अच्छी शिक्षा से प्रवीण होकर अपने पढ़ाने वाले विद्वान् वा विदुषी स्त्रियों को धन आदि अच्छे-अच्छे पदार्थों को देकर उनकी सेवा करें। माता और पिता आठ-आठ वर्ष के पुत्र वा आठ-आठ वर्ष की कन्याओं को विद्याभ्यास, ब्रह्मचर्य्य सेवन और अच्छी शिक्षा किये जाने के लिये विद्वान् और विदुषी स्त्रियों को सौंप दें। वे भी विद्या ग्रहण करने में नित्य मन लगावें और पढ़ाने वाले भी विद्या और अच्छी शिक्षा देने में नित्य प्रयत्न करें॥३३॥
Subject
पढ़ने और पढ़ाने वालों का परस्पर व्यवहार अगले मन्त्र में कहा है॥