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Yajurveda - Mantra 23

Yajurveda Adhyay 7 / Mantra 23

48 Mantra
7/23
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- वत्सार काश्यप ऋषिः Chhand- अनुष्टुप्,प्राजापत्या अनुष्टुप्,स्वराट् साम्नी अनुष्टुप्,भूरिक् आर्ची गायत्री,भूरिक् साम्नी अनुष्टुप् Swara- षड्जः, गान्धारः
Mantra with Swara
मि॒त्रावरु॑णाभ्यां त्वा देवा॒व्यं य॒ज्ञस्यायु॑षे गृह्णा॒मीन्द्रा॑य त्वा देवा॒व्यं य॒ज्ञस्यायु॑षे गृह्णा॒मीन्द्रा॒ग्निभ्यां॑ त्वा देवा॒व्यं य॒ज्ञस्यायु॑षे गृह्णा॒मीन्द्रा॒वरु॑णाभ्यां त्वा देवा॒व्यं य॒ज्ञस्यायु॑षे गृह्णा॒मीन्द्रा॒बृह॒स्पति॑भ्यां त्वा देवा॒व्यं य॒ज्ञस्यायु॑षे गृह्णा॒मीन्द्रा॒विष्णु॑भ्यां त्वा देवा॒व्यं य॒ज्ञस्यायु॑षे गृह्णामि॥२३॥

मि॒त्रावरु॑णाभ्याम्। त्वा॒। दे॒वा॒व्य᳖मिति॑ देवऽअ॒व्य᳖म्। य॒ज्ञस्य॑। आयु॑षे। गृ॒ह्णा॒मि॒। इन्द्रा॑य। त्वा॒। दे॒वा॒व्य᳖मिति॑ देवऽअ॒व्य᳖म्। य॒ज्ञस्य॑। आयु॑षे। गृ॒ह्णा॒मि॒। इ॒न्द्रा॒ग्निभ्या॒मिती॑न्द्रा॒ग्निऽभ्या॑म्। त्वा॒। दे॒वा॒व्य᳖मिति॑ देवऽअ॒व्य᳖म्। य॒ज्ञस्य॑। आयु॑षे। गृ॒ह्णा॒मि॒। इन्द्रा॒वरु॑णाभ्याम्। त्वा॒। दे॒वा॒व्य᳖मिति॑ देवऽअ॒व्य᳖म्। य॒ज्ञस्य॑। आयु॑षे। गृ॒ह्णा॒मि॒। इन्द्रा॒बृह॒स्पति॑भ्या॒मितीन्द्राबृह॒स्पति॑ऽभ्याम्। त्वा॒। दे॒वा॒व्य᳖मिति॑ देवऽअ॒व्य᳖म्। य॒ज्ञस्य॑। आयु॑षे। गृ॒ह्णा॒मि॒। इन्द्रा॒विष्णु॑भ्या॒मितीन्द्रा॒विष्णुभ्या॒मितीन्द्रा॒विष्णु॑ऽभ्याम्। त्वा॒। दे॒वा॒व्य᳖मिति॑ देवऽअ॒व्य᳖म्। य॒ज्ञस्य॑। आयु॑षे। गृ॒ह्णा॒मि॒ ॥२३॥

Mantra without Swara
मित्रावरुणाभ्यान्त्वा देवाव्यं देवाव्यँयज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राय त्वा देवाव्यँयज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राग्निभ्यान्त्वा देवाव्यँयज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्रावरुणाभ्यान्त्वा देवाव्यँयज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राबृहस्पतिभ्यान्त्वा देवाव्यँयज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राविष्णुभ्यान्त्वा देवाव्यँयज्ञस्यायुषे गृह्णामि ॥

मित्रावरुणाभ्याम्। त्वा। देवाव्यमिति देवऽअव्यम्। यज्ञस्य। आयुषे। गृह्णामि। इन्द्राय। त्वा। देवाव्यमिति देवऽअव्यम्। यज्ञस्य। आयुषे। गृह्णामि। इन्द्राग्निभ्यामितीन्द्राग्निऽभ्याम्। त्वा। देवाव्यमिति देवऽअव्यम्। यज्ञस्य। आयुषे। गृह्णामि। इन्द्रावरुणाभ्याम्। त्वा। देवाव्यमिति देवऽअव्यम्। यज्ञस्य। आयुषे। गृह्णामि। इन्द्राबृहस्पतिभ्यामितीन्द्रा- बृहस्पतिऽभ्याम्। त्वा। देवाव्यमिति देवऽअव्यम्। यज्ञस्य। आयुषे। गृह्णामि। इन्द्राविष्णुभ्यामितीन्द्राविष्णुभ्यामितीन्द्रा- विष्णुऽभ्याम्। त्वा। देवाव्यमिति देवऽअव्यम्। यज्ञस्य। आयुषे। गृह्णामि॥२३॥

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Meaning
हे सभापते! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की इच्छा करने वाला मैं (यज्ञस्य) अग्निहोत्र से लेकर राज्य पालन पर्य्यन्त यज्ञ की (आयुषे) उन्नति होने के लिये (मित्रावरुणाभ्याम्) मित्र और उत्तम विद्यायुक्त पुरुषों के अर्थ (देवाव्यम्) विद्वानों की रक्षा करने वाले (त्वा) तुझको (गृह्णामि) स्वीकार करता हूं। हे सेनापते विद्वन्! (यज्ञस्य) सत्संगति करने की (आयुषे) उन्नति के लिये (इन्द्राय) परमैश्वर्य्यवान् पुरुष के अर्थ (देवाव्यम्) विद्वानों की रक्षा करने वाला (त्वा) तुझ को (गृह्णामि) ग्रहण करता हूं। हे शस्त्रास्त्रविद्या के जानने वाले प्रवीण! (यज्ञस्य) शिल्पविद्या के कामों की सिद्धि की (आयुषे) प्राप्ति के लिये (इन्द्राग्निभ्याम्) बिजुली और प्रसिद्ध आग के गुण प्रकाश होने के अर्थ (देवाव्यम्) दिव्य विद्या बोध की रक्षा करने वाले (त्वा) तुझको (गृह्णामि) ग्रहण करता हूं। हे शिल्पिन्! (यज्ञस्य) क्रिया-चतुराई का (आयुषे) ज्ञान होने के (इन्द्रावरुणाभ्याम्) बिजुली और जल के गुण प्रकाश होने के अर्थ (देवाव्यम्) उन की विद्या जानने वाले (त्वा) तुझ को (गृह्णामि) ग्रहण करता हूं। हे अध्यापक! (यज्ञस्य) पढ़ने-पढ़ाने की (आयुषे) उन्नति के लिये (इन्द्राबृहस्पतिभ्याम्) राजा और शस्त्रवेत्ताओं के अर्थ (देवाव्यम्) प्रशंसित योगविद्या के जानने और प्राप्त कराने वाले (त्वा) तुझको (गृह्णामि) ग्रहण करता हूं। हे विद्वन्! (यज्ञस्य) विज्ञान की (आयुषे) बढ़ती के लिये (इन्द्राविष्णुभ्याम्) ईश्वर और वेदशास्त्र के जानने के अर्थ (देवाव्यम्) ब्रह्मज्ञानी को तृप्त करने वाले (त्वा) तुझको (गृह्णामि) ग्रहण करता हूं॥२३॥
Essence
प्रजाजनों को उचित है कि सकल शास्त्र का प्रचार होने के लिये सब विद्याओं में कुशल और अत्यन्त ब्रह्मचर्य्य के अनुष्ठान करने वाले पुरुष को सभापति करें और यह वह सभापति भी परम प्रीति के साथ सकल शास्त्र का प्रचार करता कराता रहे॥२३॥
Subject
सब विद्याओं में प्रवीण पुरुष को सभा का अधिकारी करे, यह अगले मन्त्र में कहा है॥