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Yajurveda - Mantra 17

Yajurveda Adhyay 6 / Mantra 17

37 Mantra
6/17
Devata- आपो देवताः Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- निचृत् ब्राह्मी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इ॒दमा॑पः॒ प्रव॑हताव॒द्यं च॒ मलं॑ च॒ यत्। यच्चा॑भिदु॒द्रोहानृ॑तं॒ यच्च॑ शे॒पेऽअ॑भी॒रुण॑म्। आपो॑ मा॒ तस्मा॒देन॑सः॒ पव॑मानश्च मुञ्चतु॥१७॥

इ॒दम्। आ॒पः॒। प्र। व॒ह॒त॒। अ॒व॒द्यम्। च॒ मल॑म्। च॒। यत्। यत्। च॒। अ॒भि॒दु॒द्रोहेत्य॑भिऽदु॒द्रोह॑। अनृ॑तम्। यत्। च॒। शे॒पे। अभी॒रुण॑म्। आपः॑। मा॒। तस्मा॑त्। एन॑सः। पव॑मानः। च॒। मु॒ञ्च॒तु॒ ॥१७॥

Mantra without Swara
इदमापः प्रवहतावद्यञ्च मलञ्च यत् । यच्चाभिदुद्रोहानृतं यच्च शेपे अभीरुणम् । आपो मा तस्मादेनसः पवमानश्च मुञ्चतु ॥

इदम्। आपः। प्र। वहत। अवद्यम्। च मलम्। च। यत्। यत्। च। अभिदुद्रोहेत्यभिऽदुद्रोह। अनृतम्। यत्। च। शेपे। अभीरुणम्। आपः। मा। तस्मात्। एनसः। पवमानः। च। मुञ्चतु॥१७॥

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Meaning
भो (आपः) सर्वविद्याव्यापक विद्वान् लोगो! आप जैसे (आपः) जल शुद्धि करते हैं, वैसे मेरा (यत्) जो (अवद्यम्) अकथनीय निन्द्यकर्म (च) और विकार तथा (यत्) जो (मलम्) अविद्यारूपी मल है, (इदम्) इस को (प्रवहत) बहाइये अर्थात् दूर कीजिये। (च) और (यत्) जो मैं (अनृतम्) झूंठ-मूंठ किसी से (दुद्रोह) द्रोह करता होऊं (च) और (यत्) जो (अभीरुणम्) निर्भय निरपराधी पुरुष को (शेपे) उलाहने देता हूं (तस्मात्) उस उक्त (एनसः) पाप से (मा) मुझे अलग रक्खो (च) और जैसे (पवमानः) पवित्र व्यवहार (मा) मुझसे पाप से अलग रखता है, वैसे (च) अन्य मनुष्यों को भी रक्खे॥१७॥
Essence
जैसे जल सांसारिक पदार्थों का शुद्धि का निदान है, वैसे विद्वान् लोग सुधार का निदान हैं, इस से वे अच्छे कामों को करें। मनुष्यों को चाहिये कि ईश्वर की उपासना और विद्वानों के संग से दुष्टाचरणों को छोड़ सदा धर्म में प्रवृत्त रहें॥१७॥
Subject
अब निर्दोष जल से क्या संभावना करनी चाहिये, यह अगले मन्त्र में उपदेश किया है॥