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Yajurveda - Mantra 29

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 29

43 Mantra
5/29
Devata- ईश्वरसभाध्यक्षौ देवते Rishi- औतथ्यो दीर्घतमा ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
परि॑ त्वा गिर्वणो॒ गिर॑ऽइ॒मा भ॑वन्तु वि॒श्वतः॑। वृ॒द्धायु॒मनु॒ वृद्ध॑यो॒ जुष्टा॑ भवन्तु॒ जुष्ट॑यः॥२९॥

परि॑। त्वा। गि॒र्व॒णः॒। गिरः॑। इ॒माः। भ॒व॒न्तु॒। वि॒श्वतः॑। वृ॒द्धायु॒मिति॑ वृ॒द्धऽआ॑युम्। अनु॑। वृद्ध॑यः। जुष्टाः॑। भ॒व॒न्तु॒। जुष्ट॑यः ॥२९॥

Mantra without Swara
परि त्वा गिर्वणो गिर इमा भवन्तु विश्वतः । वृद्धायुमनु वृद्धयो जुष्टा भवन्तु जुष्टयः ॥

परि। त्वा। गिर्वणः। गिरः। इमाः। भवन्तु। विश्वतः। वृद्धायुमिति वृद्धऽआयुम्। अनु। वृद्धयः। जुष्टाः। भवन्तु। जुष्टयः॥२९॥

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1 Bhashyas
Meaning
हे (गिर्वणः) स्तुतियों से स्तुति करने योग्य ईश्वर वा सभाध्यक्ष! (इमाः) ये मेरी की हुई (विश्वतः) समस्त (गिरः) स्तुतियाँ (परि) सब प्रकार से (भवन्तु) हों और उसी समय की ही न हों, किन्तु (वृद्धायुम्) वृद्धों के समान आचरण करने वाले आपके (अनु) पश्चात् (वृद्धयः) अत्यन्त बढ़ती हुई और (जुष्टयः) प्रीति करने योग्य (जुष्टाः) प्यारी हों॥२९॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जैसे सम्पूर्ण उत्तम गुण, कर्म्मों के साथ वर्त्तमान जगदीश्वर और सभापति स्तुति करने योग्य हैं, वैसे ही तुम लोगों को भी होना चाहिये॥२९॥
Subject
ईश्वर और सभाध्यक्ष से क्या-क्या होने को योग्य है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥