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Yajurveda - Mantra 32

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 32

37 Mantra
4/32
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
सूर्य॑स्य॒ चक्षु॒रारो॑हा॒ग्नेर॒क्ष्णः क॒नीन॑कम्। यत्रैत॑शेभि॒रीय॑से॒ भ्राज॑मानो विप॒श्चिता॑॥३२॥

सूर्य्य॑स्य। चक्षुः॑। आ। रो॒ह॒। अ॒ग्नेः। अ॒क्ष्णः। क॒नीन॑कम्। यत्र॑। एत॑शेभिः। ईय॑से। भ्राज॑मानः। वि॒प॒श्चितेति॑ विपः॒ऽचिता॑ ॥३२॥

Mantra without Swara
सूर्यस्य चक्षुरारोहाग्नेरक्ष्णः कनीनकम् । यत्रैत्रशेभिरीयसे भ्राजमानो विपश्चिता ॥

सूर्य्यस्य। चक्षुः। आ। रोह। अग्नेः। अक्ष्णः। कनीनकम्। यत्र। एतशेभिः। ईयसे। भ्राजमानः। विपश्चितेति विपःऽचिता॥३२॥

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1 Bhashyas
Meaning
हे परमेश्वर! (यत्र) जहां आप (एतशेभिः) विज्ञान आदि गुणों से (भ्राजमानः) प्रकाशमान (विपश्चिता) मेधावी विद्वान् से (ईयसे) विज्ञात होते हो वा जहां प्राणवायु वा बिजुली (एतशेभिः) वेगादि गुण वा (विपश्चिता) विद्वान् से (भ्राजमानः) प्रकाशित होकर (ईयसे) विज्ञात होते हैं और जहां आप प्राण तथा बिजुली (सूर्य्यस्य) सूर्य्य वा बिजुली और (अग्नेः) भौतिक अग्नि के (अक्ष्णः) देखने के साधन (कनीनकम्) प्रकाश करने वाले (चक्षुः) नेत्रों को (आरोह) देखने के लिये कराते वा कराती हैं, वहीं हम लोग आप की उपासना और उन दोनों का उपयोग करें॥३२॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि जैसे विद्वान् लोग ईश्वर, प्राण और बिजुली के गुणों को जान, उपासना वा कार्य्यसिद्धि करते हैं, वैसे ही उनको जानकर उपासना और अपने प्रयोजनों को सदा सिद्ध करते रहें॥३२॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥