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Yajurveda - Mantra 14

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 14

37 Mantra
4/14
Devata- अग्निर्देवता Rishi- आङ्गिरस ऋषयः Chhand- स्वराट् आर्षी उष्णिक्, Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अग्ने॒ त्वꣳ सु जा॑गृहि व॒यꣳ सु म॑न्दिषीमहि। रक्षा॑ णो॒ऽअप्र॑युच्छन् प्र॒बुधे॑ नः॒ पुन॑स्कृधि॥१४॥

अग्ने॑। त्वम्। सु। जा॒गृ॒हि॒। व॒यम्। सु। म॒न्दि॒षी॒म॒हि॒। रक्ष॑। नः॒। अप्र॑युच्छ॒न्नित्यप्र॑ऽयुच्छन्। प्र॒बुध॒ इति॑ प्र॒ऽबुधे॑। न॒। पु॒न॒रिति॒ पुनः॑। कृ॒धि॒ ॥१४॥

Mantra without Swara
अग्ने त्वँ सु जागृहि वयँ सु मन्दिषीमहि । रक्षा णो अप्रयुच्छन्प्रबुधे नः पुनस्कृधि ॥

अग्ने। त्वम्। सु। जागृहि। वयम्। सु। मन्दिषीमहि। रक्ष। नः। अप्रयुच्छन्नित्यप्रऽयुच्छन्। प्रबुध इति प्रऽबुधे। न। पुनरिति पुनः। कृधि॥१४॥

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Meaning
(अग्ने) जो अग्नि (प्रबुधे) जगने के समय (सुजागृहि) अच्छे प्रकार जगाता वा जिससे (वयम्) जगत् के कर्मानुष्ठान करने वाले हम लोग (सुमन्दिषीमहि) आनन्दपूर्वक सोते हैं, जो (अप्रयुच्छन्) प्रमादरहित होके (नः) प्रमादरहित हम लोगों की (रक्ष) रक्षा तथा प्रमादसहितों को नष्ट करता और जो (नः) हम लोगों के साथ (पुनः) बार-बार इसी प्रकार (कृधि) व्यवहार करता है, उसको युक्ति के साथ सब मनुष्यों को सेवन करना चाहिये॥१४॥
Essence
मनुष्यों को जो अग्नि सोने, जागने, जीने तथा मरने का हेतु है, उसका युक्ति से सेवन करना चाहिये॥१४॥
Subject
फिर अग्नि के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥