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Yajurveda - Mantra 10

Yajurveda Adhyay 39 / Mantra 10

13 Mantra
39/10
Devata- प्राणादयो लिङ्गोक्ता देवताः Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- आकृतिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
लोम॑भ्यः॒ स्वाहा॒ लोम॑भ्यः॒ स्वाहा॑ त्व॒चे स्वाहा॑ त्व॒चे स्वाहा॒ लोहि॑ताय॒ स्वाहा॒ लोहि॑ताय॒ स्वाहा॒ मेदो॑भ्यः॒ स्वाहा॒ मेदो॑भ्यः॒ स्वाहा॑। मा॒सेभ्यः॒ स्वाहा॑ मा॒सेभ्यः॒ स्वाहा॒ स्नाव॑भ्यः॒ स्वाहा॒ स्नाव॑भ्यः॒ स्वाहा॒ऽस्थभ्यः॒ स्वाहाऽ॒स्थभ्यः॒ स्वाहा॑ म॒ज्जभ्यः॒ स्वाहा॑ म॒ज्जभ्यः॒ स्वाहा॑। रेत॑से॒ स्वाहा॑ पा॒यवे॒ स्वाहा॑॥१०॥

लोम॑भ्य॒ इति॒ लोम॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। लोम॑भ्य॒ इति॒ लोम॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। त्व॒चे। स्वाहा॑। त्व॒चे। स्वाहा॑। लोहि॑ताय। स्वाहा॑। लोहि॑ताय। स्वाहा॑। मेदो॑भ्य॒ इति॒ मेदः॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। मेदो॑भ्य॒ इति॒ मेदः॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। मा॒सेभ्यः॑। स्वाहा॑। मा॒सेभ्यः॑। स्वाहा॑। स्नाव॑भ्य॒ इति॒ स्नाव॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। स्नाव॑भ्य॒ इति॒ स्नाव॑ऽभ्यः। स्वाहा॑। अ॒स्थभ्य॒ इत्य॒स्थऽभ्यः॑। स्वाहा॑। अ॒स्थभ्य॒ इत्य॒स्थऽभ्यः॑। स्वाहा॑। म॒ज्जभ्य॒ इति॑ म॒ज्जऽभ्यः॑। स्वाहा॑। म॒ज्जभ्य॒ इति॑ म॒ज्जऽभ्यः॑। स्वाहा॑। रेत॑से॑। स्वाहा॑। पा॒यवे॑। स्वाहा॑ ॥१० ॥

Mantra without Swara
लोमभ्यः स्वाहा लोमभ्यः स्वाहा त्वचे स्वाहा त्वचे स्वाहा लोहिताय स्वाहा लोहिताय स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा । माँसेभ्यः स्वाहा माँसेभ्यः स्वाहा स्नावभ्यः स्वाहा स्नावभ्यः स्वाहास्थभ्यः स्वाहास्थभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा । रेतसे स्वाहा पायवे स्वाहा ॥

लोमभ्य इति लोमऽभ्यः। स्वाहा। लोमभ्य इति लोमऽभ्यः। स्वाहा। त्वचे। स्वाहा। त्वचे। स्वाहा। लोहिताय। स्वाहा। लोहिताय। स्वाहा। मेदोभ्य इति मेदःऽभ्यः। स्वाहा। मेदोभ्य इति मेदःऽभ्यः। स्वाहा। मासेभ्यः। स्वाहा। मासेभ्यः। स्वाहा। स्नावभ्य इति स्नावऽभ्यः। स्वाहा। स्नावभ्य इति स्नावऽभ्यः। स्वाहा। अस्थभ्य इत्यस्थऽभ्यः। स्वाहा। अस्थभ्य इत्यस्थऽभ्यः। स्वाहा। मज्जभ्य इति मज्जऽभ्यः। स्वाहा। मज्जभ्य इति मज्जऽभ्यः। स्वाहा। रेतसे। स्वाहा। पायवे। स्वाहा॥१०॥

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Meaning
मनुष्यों को चाहिये कि दाहकर्म में घी आदि से (लोमभ्यः) त्वचा के ऊपरले वालों के लिये (स्वाहा) इस शब्द का (लोमभ्यः) नख आदि के लिये (स्वाहा) (त्वचे) शरीर की त्वचा जलाने को (स्वाहा) (त्वचे) भीतरली त्वचा जलाने के लिये (स्वाहा) (लोहिताय) रुधिर जलाने को (स्वाहा) (लोहिताय) हृदयस्थ रुधिर पिण्ड जलाने को (स्वाहा) (मेदोभ्यः) चिकने धातुओं के जलाने को (स्वाहा) (मेदोभ्यः) सब शरीर के अवयवों को आर्द्र करनेवाले भागों के जलाने को (स्वाहा) (मांसेभ्यः) बाहरले मांसों के जलाने को (स्वाहा) (मांसेभ्यः) भीतरले मांसों के जलाने के लिये (स्वाहा) (स्नावभ्यः) स्थूल नाडि़यो के जलाने को (स्वाहा) (स्नावभ्यः) सूक्ष्म नाडि़यों के जलाने को (स्वाहा) (अस्थभ्यः) शरीरस्थ कठिन अवयवों के जलाने के लिये (स्वाहा) (अस्थभ्यः) सूक्ष्म अस्थिरूप अवयवों के जलाने को (स्वाहा) (मज्जभ्यः) हाड़ों के भीतर के धातुओं के लिये (स्वाहा) (मज्जभ्यः) उसके अन्तर्गत भाग के जलाने को (स्वाहा) (रेतसे) वीर्य के जलाने को (स्वाहा) और (पायवे) गुदारूप अवयव के दाह के लिये (स्वाहा) इस शब्द का निरन्तर प्रयोग करें॥१०॥
Essence
हे मनुष्यो! जब तक लोम से लेकर वीर्य्य पर्यन्त उस मृत शरीर का भस्म न हो, तब तक घी और र्इंधन डाला करो॥१०॥
Subject
मनुष्यों को भस्म होने तक शरीर का मन्त्रों से दाह करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥