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Yajurveda Adhyay 38 / Mantra 6

28 Mantra
38/6
Devata- अश्विनौ देवते Rishi- दीर्घतमा ऋषिः Chhand- निचृदत्यष्टिः Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
गा॒य॒त्रं छन्दो॑ऽसि॒ त्रैष्टु॑भं॒ छन्दो॑ऽसि॒ द्यावा॑पृथि॒वीभ्यां॑ त्वा॒ परि॑ गृह्णाम्य॒न्तरि॑क्षे॒णोप॑ यच्छामि। इन्द्रा॑श्विना॒ मधु॑नः सार॒घस्य॑ घर्मं पा॑त॒ वस॑वो॒ यज॑त॒ वाट्। स्वाहा॒ सूर्य्य॑स्य र॒श्मये॑ वृष्टि॒वन॑ये॥६॥

गा॒य॒त्रम्। छन्दः॑। अ॒सि॒। त्रैष्टु॑भम्। त्रैस्तु॑भ॒मिति॒ त्रैस्तु॑भम्। छन्दः॑। अ॒सि॒। द्यावा॑पृथि॒वीभ्या॑म्। त्वा॒। परि॑। गृ॒ह्णा॒मि॒। अ॒न्तरि॑क्षेण। उप॑। य॒च्छा॒मि॒ ॥ इन्द्र॑। अ॒श्वि॒ना॒। मधु॑नः। सा॒र॒घस्य॑। घ॒र्मम्। पा॒त॒। वस॑वः। यज॑त। वाट् ॥ स्वाहा॑। सूर्य॑स्य। र॒श्मये॑। वृ॒ष्टि॒वन॑य॒ इति॑ वृष्टि॒ऽवन॑ये ॥६ ॥

Mantra without Swara
गायत्रञ्छन्दो सि त्रैष्टुभञ्छन्दोसि द्यावापृथिवीभ्यान्त्वा परिगृह्णाम्यन्तरिक्षेणोपयच्छामि । इन्द्राश्विना मधुनः सारघस्य घर्मम्पात वसवो यजत वाट् । स्वाहा सूर्यस्य रश्मये वृष्टिवनये ॥

गायत्रम्। छन्दः। असि। त्रैष्टुभम्। त्रैस्तुभमिति त्रैस्तुभम्। छन्दः। असि। द्यावापृथिवीभ्याम्। त्वा। परि। गृह्णामि। अन्तरिक्षेण। उप। यच्छामि॥ इन्द्र। अश्विना। मधुनः। सारघस्य। घर्मम्। पात। वसवः। यजत। वाट्॥ स्वाहा। सूर्यस्य। रश्मये। वृष्टिवनय इति वृष्टिऽवनये॥६॥

Meaning
हे (इन्द्र) परम ऐश्वर्ययुक्त पुरुष! जैसे आप (गायत्रम्) गायत्री छन्द से प्रकाशित (छन्दः) स्वतन्त्र आनन्दकारक अर्थ के समान हृदय को प्रिय स्त्री को प्राप्त (असि) हैं, (त्रैष्टुभम्) त्रिष्टुप् छन्द से व्याख्यात हुए (छन्दः) स्वतन्त्र अर्थमात्र के समान प्रशंसित पत्नी को प्राप्त हुए (असि) हैं, वैसे मैं (त्वा) तुमको देखकर (द्यावापृथिवीभ्याम्) सूर्य-भूमि से अति शोभायमान प्रिया स्त्री को (परि, गृह्णामि) सब ओर से स्वीकार करता हूं और (अन्तरिक्षेण) हाथ में जल लेकर प्रतिज्ञा कराई हुई को (उप, यच्छामि) स्त्रीत्व के साथ ग्रहण करता हूं। हे (अश्विना) प्राण-अपान के तुल्य कार्यसाधक स्त्री-पुरुषो! तुम दोनों भी वैसे ही वर्त्ता करो। हे (वसवः) पृथिवी आदि वसुवों के तुल्य प्रथम कक्षा के विद्वानो! तुम लोग (स्वाहा) सत्या क्रिया से (मधुनः, सारघस्य) मक्खियों ने बनाये मधुरादि गुणयुक्त शहद और (घर्मम्) सुख पहुंचानेवाले यज्ञ की (पात) रक्षा करो। (सूर्य्यस्य) सूर्य्य के (वृष्टिवनये) वर्षा का विभाग करनेवाले (रश्मये) संशोधक किरण के लिये (वाट्) अच्छे प्रकार (यजत) संगत होओ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे शब्दों का अर्थों के साथ वाच्य-वाचक सम्बन्ध, सूर्य के साथ पृथिवी का, किरणों के साथ वर्षा का, यज्ञ के साथ यजमान और ऋत्विजों का सम्बन्ध है, वैसे ही विवाहित स्त्री-पुरुषों का सम्बन्ध होवे॥६॥
Subject
फिर भी स्त्री-पुरुष का कैसा सम्बन्ध हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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