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Yajurveda Adhyay 37 / Mantra 4

21 Mantra
37/4
Devata- यज्ञो देवता Rishi- दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिः Chhand- निचृत्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
देव्यो॑ वम्र्यो भू॒तस्य॑ प्रथम॒जा म॒खस्य॑ वो॒ऽद्य शिरो॑ राध्यासं देव॒यज॑ने पृथि॒व्याः।म॒खाय॑ त्वा म॒खस्य॑ त्वा शी॒र्ष्णे॥४॥

देव्यः॑। व॒म्र्यः। भू॒तस्य॑। प्र॒थ॒म॒जा इति॑ प्रथम॒ऽजाः। म॒खस्य॑। वः॒। अ॒द्य। शिरः॑। रा॒ध्या॒स॒म्। दे॒व॒यज॑न॒ इति॑ देव॒ऽयज॑ने। पृ॒थि॒व्याः ॥ म॒खाय॑। त्वा॒। म॒खस्य॑। त्वा॒। शी॒र्ष्णे ॥४ ॥

Mantra without Swara
देव्यो वर्म्या भूतस्य प्रथमजा मखस्य वोद्य शिरो राध्यासन्देवयजने पृथिव्याः । मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्णे ॥

देव्यः। वम्र्यः। भूतस्य। प्रथमजा इति प्रथमऽजाः। मखस्य। वः। अद्य। शिरः। राध्यासम्। देवयजन इति देवऽयजने। पृथिव्याः॥ मखाय। त्वा। मखस्य। त्वा। शीर्ष्णे॥४॥

Meaning
हे (प्रथमजाः) पहिले से हुई (वम्र्यः) थोड़ी अवस्थावाली (देव्यः) तेजस्विनी विदुषी स्त्रियो! (भूतस्य) उत्पन्न हुए (मखस्य) यज्ञ की सम्बन्धिनी (पृथिव्याः) पृथिवी के (देवयजने) उस स्थान में जहां विद्वान् लोग सङ्गति करते हैं, (अद्य) आज (वः) तुम लोगों को (शिरः) शिर के तुल्य मैं (राध्यासम्) सम्यक् सिद्ध किया करूं (मखस्य) यज्ञ का निर्माण करनेवाली (त्वा) तुझको (मखाय, शीर्ष्णे) शिर के तुल्य वर्त्तमान यज्ञ के लिये (त्वा) तुझको सम्यक् उद्यत वा सिद्ध करूं॥४॥
Essence
हे मनुष्यो! जब तक स्त्रियां विदुषी नहीं होती तब तक उत्तम शिक्षा भी नहीं बढ़ती है॥४॥
Subject
अब विदुषी स्त्रियाँ कैसी होवें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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